ऋषिकेश

माँ यशोदा जयंती पर परमार्थ निकेतन में गंगा आरती, स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने दिया मातृत्व और संस्कारों का संदेश

ऋषिकेश। माँ यशोदा जयंती के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में दिव्य भक्ति, मातृत्व, वात्सल्य एवं सनातन संस्कृति की गरिमा से ओतप्रोत वातावरण देखने को मिला। इस अवसर पर आयोजित परमार्थ गंगा आरती माँ यशोदा जी को समर्पित की गई।

इस विशेष अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने माँ यशोदा के निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और मातृशक्ति को सनातन संस्कृति का दिव्य प्रतिबिंब बताते हुए कहा कि माँ यशोदा मातृत्व की जीवंत चेतना हैं। उन्होंने कहा, “माँ का प्रेम शर्तों से परे होता है। वह त्याग, करुणा और समर्पण का सर्वोच्च स्वरूप है।”

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आज के युग में जब परिवारों में दूरी, तनाव और स्वार्थ बढ़ रहा है, ऐसे समय में माँ यशोदा का जीवन हमें परिवार, संस्कार और प्रेम के मूल्यों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है। मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संरक्षण, पोषण और मार्गदर्शन की निरंतर प्रक्रिया है। यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को केवल पाला ही नहीं, बल्कि उन्हें धर्म, साहस और करुणा के संस्कार भी दिए, जो सनातन संस्कृति की पहचान हैं।

उन्होंने कहा कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम है। जब हृदय में निष्काम प्रेम होता है, वही भक्ति का स्वरूप बन जाता है। स्वामी जी ने माताओं और युवाओं से आग्रह किया कि वे बच्चों में संस्कार, संवेदनशीलता और सेवा की भावना विकसित करें, ताकि आने वाली पीढ़ी आध्यात्मिक और नैतिक रूप से सशक्त बन सके।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान सर्वोपरि है—मातृभूमि, मातृभाषा और गंगा माँ सभी मातृत्व की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। माँ का सम्मान ही प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्र के सम्मान का आधार है। माँ यशोदा जयंती यह स्मरण कराती है कि समाज तभी सशक्त होगा, जब मातृशक्ति का सम्मान और सशक्तिकरण होगा।

उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में जब रिश्तों की ऊष्मा कम होती जा रही है, तब मातृत्व, ममता, वात्सल्य और संस्कारों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली प्रथम गुरु होती है। माँ की गोद पहला विद्यालय है, जहाँ से मानवता, नैतिकता और संवेदनशीलता के पाठ प्रारंभ होते हैं।

स्वामी जी ने परिवारों से आग्रह किया कि वे बच्चों के साथ समय बिताएँ और उन्हें तकनीक से अधिक परंपरा और संस्कृति से जोड़ें, क्योंकि संस्कारहीन प्रगति अधूरी है। मातृत्व और वात्सल्य ही वह आधार हैं, जो समाज को प्रेम, शांति और एकता से जोड़ते हैं। वास्तव में, माँ का आशीर्वाद ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।

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