जंगलों की आग से बढ़ा खतरा, पर्यावरण व वन्यजीवों पर गंभीर असर
द्वारीखाल/पौड़ी गढ़वाल। पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं अब गंभीर रूप लेती जा रही हैं। पहले जहां यह समस्या केवल गर्मियों तक सीमित रहती थी, वहीं अब पिछले कुछ वर्षों से जनवरी माह से ही आग की घटनाएं सामने आने लगी हैं, जो पर्यावरणीय बदलाव और मानवीय गतिविधियों की ओर संकेत करती हैं।

वन विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों में आग लगने के पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवीय लापरवाही और जानबूझकर लगाई गई आग भी जिम्मेदार है। सूखी घास-पत्तियां और बढ़ता तापमान आग को तेजी से फैलने में मदद करते हैं।
पहाड़ों में चीड़ के जंगलों में आग लगना आम रहा है, क्योंकि इसकी पत्तियां (पिरूल) अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं। वहीं लैंटाना जैसी झाड़ी के तेजी से फैलाव ने अब निचले क्षेत्रों में भी आग का खतरा बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीड़ के अत्यधिक विस्तार के कारण बांज, बुरांश, काफल एवं आंवला जैसे पारंपरिक पेड़ संकट में हैं, जो जल स्रोतों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जंगलों की आग का असर वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। घुरड़, काकड़ और खरगोश जैसे कई जीव आग और धुएं की चपेट में आकर जान गंवा देते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पहाड़ों के जल स्रोत सूखने और जैव विविधता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने, पारंपरिक वृक्षों के संरक्षण और ठोस वन प्रबंधन नीतियों को लागू करने पर जोर दिया है।
