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हिंदी के लोककवि हरिवंश राय बच्चन : ‘मधुशाला’ से जन–जन के हृदय तक

हिंदी साहित्य के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में शुमार हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को प्रयागराज में हुआ था। अपनी सरल, संगीतमय और भावप्रवण कविता के माध्यम से उन्होंने हिंदी को आम जनमानस से जोड़ा। 18 जनवरी 2003 को मुंबई में सांस की बीमारी के कारण उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी साहित्य प्रेमियों के बीच जीवित हैं।

हरिवंश राय बच्चन को विशेष पहचान उनकी अमर कृति ‘मधुशाला’ (1935) से मिली, जिसने हिंदी कविता को नई दिशा दी। इसके बाद ‘मधुबाला’ (1936) जैसी रचनाओं ने उनकी लोकप्रियता को और व्यापक बनाया। उनका पहला कविता संग्रह ‘तेरा हार’ (1929) साहित्य जगत में एक सशक्त आरंभ माना जाता है।

बच्चन जी ने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा सेंट कैथेराइन कॉलेज, कैंब्रिज से प्राप्त की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दीं। साहित्य और भाषा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यसभा का मनोनीत सदस्य भी बनाया गया।

साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें पद्मभूषण (1976) से सम्मानित किया गया। उनकी आत्मकथात्मक रचनाएं—‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ (1969), ‘नीड़ का पत्थर’ (1970)—उनके जीवन संघर्ष, संवेदनाओं और विचारों का सजीव दस्तावेज हैं।

हरिवंश राय बच्चन के पुत्र, हिंदी सिनेमा के मेगास्टार अमिताभ बच्चन, ने भी अपने पिता की साहित्यिक विरासत को गर्व के साथ आगे बढ़ाया। हरिवंश राय बच्चन न केवल एक महान कवि थे, बल्कि हिंदी को लोकभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले युगद्रष्टा साहित्यकार भी थे, जिनकी कविताएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं।

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