परमवीर चक्र विजेता लांस नायक करम सिंह : वीरता और समर्पण की अमर गाथा
परमवीर चक्र विजेता लांस नायक करम सिंह : वीरता और समर्पण की अमर गाथा
भारत माँ की मिट्टी ने अनेक वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी। उन्हीं में से एक हैं लांस नायक करम सिंह, जिन्हें वर्ष 1948 में जम्मू–कश्मीर युद्ध में अदम्य साहस और वीरता के लिए देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वे परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले दूसरे सैनिक थे।

प्रारंभिक जीवन
लांस नायक करम सिंह का जन्म 15 सितम्बर 1915 को पंजाब के संगरूर जिले के सिहर गाँव में हुआ। वे एक साधारण किसान परिवार से थे। बचपन से ही उनमें देशभक्ति और साहस कूट–कूट कर भरा था। 1941 में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होकर सैनिक जीवन की शुरुआत की।
सैन्य जीवन और योगदान
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान करम सिंह ने बर्मा मोर्चे पर ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ सेवा दी। इस अनुभव ने उन्हें और अधिक साहसी और अनुशासित बना दिया। स्वतंत्रता के बाद वे सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन (1 सिख) में शामिल हुए।
1948 का जम्मू–कश्मीर युद्ध
भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इसी दौरान 13–14 अक्टूबर 1948 को पुंछ सेक्टर में तितवाल की लड़ाई हुई।
पाकिस्तान की सेना ने भारतीय चौकियों पर लगातार हमला किया।
करम सिंह उस पोस्ट पर तैनात थे, जिस पर दुश्मन ने भारी गोलाबारी की।
गोलियों और गोले–बारूद की वर्षा के बावजूद करम सिंह ने अपने साथियों का हौसला बढ़ाया और अपनी पोस्ट को खाली नहीं होने दिया।
कई साथी शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन के हमले को विफल कर दिया।
उनकी बहादुरी और नेतृत्व से भारतीय सेना ने पोस्ट को बचाए रखा और दुश्मन पीछे हटने को मजबूर हुआ।
परमवीर चक्र सम्मान
उनकी अदम्य वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को देखते हुए 26 जनवरी 1950 को उन्हें मरणोपरांत नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे उन गिने-चुने वीरों में से एक हैं जिन्होंने यह सर्वोच्च सम्मान जीवित रहते हुए प्राप्त किया।
बाद का जीवन
परमवीर चक्र प्राप्त करने के बाद भी करम सिंह ने भारतीय सेना में सेवा जारी रखी और सूबेदार मेजर के पद तक पहुंचे। वे सिख रेजिमेंट के जवानों के लिए प्रेरणा बने रहे।
उनका निधन 20 जनवरी 1993 को हुआ।
स्मृति और प्रेरणा
उनके गाँव में उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया है।
भारतीय सेना में उन्हें “तितवाल के शेर” के नाम से जाना जाता है।
आज भी जब भारतीय सेना की वीरता की चर्चा होती है तो लांस नायक करम सिंह का नाम गर्व और सम्मान से लिया जाता है।
निष्कर्ष
लांस नायक करम सिंह की गाथा केवल एक सैनिक की नहीं बल्कि उस भावना की है जो मातृभूमि की रक्षा के लिए हर बलिदान को छोटा मानती है। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम के सच्चे प्रतीक हैं।
