उत्तराखंड

गिर्दा: गीतों में हिमालय की पीड़ा

आज जब हम गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का जन्मदिवस मना रहे हैं, तो ऐसा लगता है मानो उनके गीतों की गूंज अब भी पहाड़ों की घाटियों, नदियों और जंगलों में तैर रही हो।

गिर्दा ने अपने स्वर में उस पीड़ा को पिरोया, जिसे हिमालय बरसों से अपने भीतर दबाए बैठा है।उनके गीत सिर्फ़ लोकधुन नहीं थे, बल्कि पहाड़ की आवाज़ थे।

“कभी जंगल की चीख, कभी नदियों की पुकार,

कभी पहाड़ की थकान, तो कभी औरतों का संघर्ष।”

गिर्दा ने हमें बताया कि हिमालय सिर्फ़ पत्थर और बर्फ का ढेर नहीं,

बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी अस्मिता और हमारी सांसों की डोर है।

हिमालय का दर्द और खनन की चोट

आज हिमालय कराह रहा है।

अंधाधुंध खनन, सड़कें बिना सोचे-समझे काटना, नदियों को बाँधना —

यह सब उसकी देह पर गहरे घावों की तरह हैं।

गिर्दा कहते थे — “पहाड़ को समझे बिना विकास की बातें करना, उसके साथ विश्वासघात है।”

उनकी यह चेतावनी आज सच साबित हो रही है।

बार-बार आपदाएँ हमें याद दिला रही हैं कि हमने हिमालय की सहनशीलता की सीमा लांघ दी है।

लेकिन गिर्दा यह भी मानते थे कि संसाधनों का उपयोग बंद करना हल नहीं है।

खनन हो, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से;

विकास हो, लेकिन प्रकृति की धड़कनों को समझकर।

वैज्ञानिक विकास और लोक की भागीदारी

गिर्दा हमेशा कहते थे कि विकास की असली राह वही है,

जिसमें जनता की भागीदारी हो और प्रकृति की मर्यादा भी बनी रहे।

खनन अगर भूगर्भीय अध्ययन और आधुनिक तकनीक से नियंत्रित होगा,

तो न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि रोजगार भी मिलेगा।

हमें यह भी समझना होगा कि जल-जंगल-जमीन के असली मालिक पहाड़ के लोग हैं।

उनकी सहमति, उनकी जरूरत और उनका हित ही हर योजना का आधार होना चाहिए।

निष्कर्ष: गिर्दा की राह पर

गिर्दा के गीत आज भी हमें पुकारते हैं —

“जागो, हिमालय खतरे में है,

जागो, अपने अधिकारों के लिए।”

उनकी स्मृति हमें यह सीख देती है कि विकास और पर्यावरण विरोधी नहीं,

बल्कि पूरक हैं — बशर्ते हम संतुलन साधना सीख लें।

गिर्दा का जन्मदिवस हमें याद दिलाता है कि उनके सपनों का पहाड़

वह होगा, जहाँ विज्ञान और लोकबुद्धि साथ चलें,

जहाँ विकास के साथ-साथ हिमालय की पीड़ा भी सुनी जाए।

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