भारत ने EU प्रतिबंधों पर कड़ा रुख अपनाया: “डबल स्टैंडर्ड” पर निशाना, UK-कनाडा को मिली छूट, भारत को निशाना क्यों?
नई दिल्ली, 20 जुलाई 2025 — भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऊर्जा व्यापार को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। EU ने हाल ही में अपनी 18वीं प्रतिबंध श्रृंखला में भारत में रूसी कंपनी रोसनेफ्ट की आंशिक स्वामित्व वाली वदिनार रिफाइनरी को निशाना बनाया, जबकि उसने यूके, कनाडा, सिंगापुर जैसे देशों की कंपनियों को ऐसे ही “रूसी कनेक्टेड” व्यापार से छूट दी है। भारत ने इसे स्पष्ट रूप से “दोहरे मापदंड” करार देते हुए खंडन किया है और अपनी ऊर्जा नीति में स्वतंत्रता की बात दोहराई है।

🔴 यूरोपीय संघ की दोहरी नीति: एक नजर
🇬🇧 ब्रिटेन को छूट:
कई रिपोर्ट्स से खुलासा हुआ है कि लंदन स्थित तेल ट्रेडिंग फर्म्स जैसे Vitol और Trafigura अब भी परोक्ष रूप से रूसी तेल को वैश्विक बाजार में व्यापार कर रही हैं।
ब्रिटिश शिपिंग कंपनियां प्रतिबंधों से मुक्त होकर तटीय मार्गों पर सक्रिय हैं।
🇨🇦 कनाडा की स्थिति:
कनाडा की एनर्जी लॉबी और रिफाइनरियों को रूसी मूल के उर्वरक और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर छूट दी गई है।
प्रतिबंध सूची में कनाडा की कई फर्मों को जानबूझकर शामिल नहीं किया गया।
🇸🇬 सिंगापुर:
कई रूसी जहाज सिंगापुर के माध्यम से व्यापार कर रहे हैं, लेकिन EU द्वारा इस पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
🇮🇳 लेकिन भारत?
नयारा एनर्जी (जिसमें रोसनेफ्ट की 49.13% हिस्सेदारी है) की वदिनार रिफाइनरी को EU की 18वीं प्रतिबंध सूची में शामिल कर दिया गया।
यह वही रिफाइनरी है जो भारतीय घरेलू जरूरतों को पूरा करती है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
🔹 भारत का तीखा जवाब: दोहरे मापदंड क्यों?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने कहा:
> “जब कुछ देश छूट पा रहे हैं और भारत को निशाना बनाया जा रहा है, तो यह दोहरे मानकों का खुला उदाहरण है। हम इस किस्म के असमान व्यवहार को नहीं मानते।”
उन्होंने यह भी जोड़ा:
> “भारत किसी भी बाहरी दबाव या नीति से नहीं चलेगा, विशेषकर जब वह अपने नागरिकों की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहा हो।”
🔹 जयशंकर का जवाब: हम नीति किसी और से नहीं पूछते
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ब्रसेल्स में प्रेस कांफ्रेंस में EU की दोहरी नीति पर सीधे हमला बोला:
> “हम अपनी ऊर्जा नीति किसी बाहरी निर्देश या लाइसेंस के आधार पर तय नहीं करते। जब वही देश, जो हमें नैतिकता सिखा रहे हैं, खुद छूट ले रहे हैं, तो यह एकतरफा निर्णय विश्वसनीयता खो बैठते हैं।”
उनके बयान से साफ संकेत था कि भारत अपने ऊर्जा व्यापार को किसी भी तरह की भेदभावपूर्ण वैश्विक नीति से प्रभावित नहीं होने देगा।
🔍 डबल स्टैंडर्ड्स के परिणाम: वैश्विक राजनीति में असंतुलन
🌍 क्या कहता है वैश्विक दक्षिण?
कई अफ्रीकी और एशियाई देश, जो रूस से व्यापार कर रहे हैं, इस तरह के प्रतिबंधों को पश्चिम की मनमानी और नीतिगत साम्राज्यवाद करार दे चुके हैं।
भारत की स्पष्ट प्रतिक्रिया अब वैश्विक दक्षिण की ओर से आवाज बनती जा रही है।
📊 अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की राय:
> “अगर कोई नीति कुछ देशों को छूट देती है और बाकी को सजा देती है, तो वह नीति नैतिक नहीं, राजनीतिक है।”
> “EU को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर यूके और कनाडा जैसे देशों को कैसे और क्यों राहत दी गई जबकि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को दंडित किया गया?”
🔹 भारत की मांग: समान नियम, समान व्यवहार
भारत ने दो प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया है:
1. ऊर्जा व्यापार को राजनीतिक हथियार न बनाया जाए।
2. सभी देशों के साथ समान नीति और निष्पक्ष व्यवहार किया जाए।
🛢️ क्या अब भारत रूसी तेल से हटेगा? नहीं।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देता है। Nayara Energy, Reliance, IOC जैसी कंपनियां आगे भी रूस से कच्चा तेल खरीदती रहेंगी।
> “जब तक भारत को वहां से सस्ती और स्थिर आपूर्ति मिल रही है, भारत विकल्प नहीं बदलेगा” — वरिष्ठ ऊर्जा सलाहकार, नीति आयोग
🔚 निष्कर्ष: भारत का आत्मविश्वास बढ़ा, पश्चिम को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए
यूरोपीय संघ का रवैया भारत के लिए एक चुनौती जरूर है, लेकिन इससे भारत की ऊर्जा नीति डगमगाएगी नहीं। भारत ने अपनी कूटनीतिक समझदारी और आत्मनिर्भर ऊर्जा रणनीति से न केवल पश्चिमी दबाव का विरोध किया है, बल्कि एक उदाहरण भी पेश किया है कि वैश्विक दक्षिण अब चुप नहीं रहेगा।
यह लड़ाई सिर्फ तेल की नहीं, संप्रभुता और निष्पक्षता की है।
भारत ने बता दिया है — जब नैतिकता की बात होगी, तो पहले दर्पण देखा जाए।
