ऋषिकेश में भक्ति और साधना का संगम, नवरात्रि पर्व पर परमार्थ निकेतन में विशेष आयोजन
नवरात्रि आत्मशुद्धि और आंतरिक जागरण का पर्व — स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले
ऋषिकेश। पवित्र नगरी ऋषिकेश में नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ की जा रही है। यह पर्व जीवन में संयम, नियंत्रण और साधना के महत्व का संदेश देता है, साथ ही व्यक्ति को आत्मचिंतन और आंतरिक जागरण के लिए प्रेरित करता है।
नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में शुद्धता लाने का एक सशक्त माध्यम भी है। उपवास का वास्तविक अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन के विकारों जैसे क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष से दूरी बनाना भी है।

परमार्थ निकेतन में इस अवसर पर नवरात्रि उत्सव अत्यंत आध्यात्मिक वातावरण में मनाया जा रहा है। यहां आयोजित नवरात्रि रिट्रिट में साधकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। गंगा तट पर आयोजित दिव्य गंगा आरती में श्रद्धालु माँ दुर्गा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त कर रहे हैं। इस दौरान यज्ञ, भजन-कीर्तन, योग, ध्यान-साधना सहित विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने संदेश में कहा कि नवरात्रि हमें केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि आंतरिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि आज के तनावपूर्ण और व्यस्त जीवन में नवरात्रि का स्वयं से जुड़ने का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
उन्होंने बताया कि संयमित जीवनशैली, सकारात्मक सोच और नियमित साधना से ही व्यक्ति मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बन सकता है। नवरात्रि के नौ दिन हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
स्वामी जी ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि नवरात्रि उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें अपने संस्कारों और मूल्यों से जोड़ती है तथा जीवन में अनुशासन और संतुलन बनाए रखने की सीख देती है। यदि युवा वर्ग इस पर्व के वास्तविक अर्थ को अपनाए, तो वे न केवल स्वयं को बल्कि समाज और राष्ट्र को भी सशक्त बना सकते हैं।
नवरात्रि का यह पावन पर्व सभी को संयम, साधना और सकारात्मक जीवन मूल्यों को अपनाकर एक श्रेष्ठ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
