प्रयागराज

प्रयागराज संगम तट पर श्रीमद् जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी का 726वाँ प्राकट्य महोत्सव भव्यता से सम्पन्न

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। सनातन संस्कृति, भक्ति परम्परा और राष्ट्रीय चेतना के अद्वितीय संगम के रूप में प्रयागराज संगम तट पर श्रीमद् जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी के 726वें प्राकट्य महोत्सव का आयोजन अत्यंत दिव्य, भव्य एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। यह ऐतिहासिक आयोजन श्री जगद्गुरू महामण्डलेश्वर संतोषदास जी महाराज (सतुआ बाबा) के पावन शिविर में आयोजित किया गया, जहाँ श्रद्धा, साधना, सेवा और समर्पण की त्रिवेणी प्रवाहित होती रही।

इस पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती सहित देश–विदेश से पधारे अनेक संत–महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति ने समारोह को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। संगम तट पर आयोजित माघ मेले की दिव्यता और संत-सान्निध्य ने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक मंत्रोच्चार, दीप प्रज्वलन एवं संगम तट की पवित्र धरा पर पुष्पांजलि अर्पण के साथ हुआ। इसके पश्चात संतों के मंगल उद्बोधनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को श्री रामानन्दाचार्य जी के जीवन, दर्शन एवं भक्ति परम्परा की अमूल्य विरासत से परिचित कराया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीमद् जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी ने भक्ति को जन–जन तक पहुँचाकर सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रबोध की अलख जगाई। उन्होंने भक्ति आन्दोलन को जनआन्दोलन का स्वरूप दिया और समाज को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज का भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पथ पर अग्रसर है, जिसमें संत परम्परा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि श्री रामानन्दाचार्य जी सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे, जिन्होंने जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर भक्ति, प्रेम और मानवता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि का भजे सो हरि का होई” केवल दोहा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उद्घोष है, जो समानता और सम्मान का संदेश देता है। स्वामी जी ने कहा कि प्रभु को पाने के लिए कुल नहीं, करुणा चाहिए; वंश नहीं, विश्वास चाहिए।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उत्तर प्रदेश के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज उत्तर प्रदेश दंगा-मुक्त, अपराध-मुक्त और विकास की नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि यह नया भारत और नया उत्तर प्रदेश है, जो विकास और विरासत को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

जगतगुरु महामण्डलेश्वर संतोषदास जी महाराज (सतुआ बाबा) ने अपने भावपूर्ण संबोधन में कहा कि यह महोत्सव केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का पर्व है। उन्होंने कहा कि श्री रामानन्दाचार्य जी की परम्परा आज भी हमें यह संदेश देती है कि भक्ति में ही शक्ति है और सेवा में ही सच्ची साधना है।

संगम तट पर उपस्थित हजारों श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन के साक्षी बनकर स्वयं को सौभाग्यशाली अनुभव कर रहे थे। चारों ओर “जय श्री रामानन्दाचार्य”, “हर हर गंगे” और “भारत माता की जय” के गगनभेदी उद्घोष गूँजते रहे।

माघ मेले की पावन भूमि पर सम्पन्न यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना का भी प्रतीक बना। समारोह के अंत में संगम आरती, राष्ट्रगान एवं विश्व शांति प्रार्थना के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हिन्दी शब्दों से संस्कार तक की यात्रा है। हिन्दी केवल भाषा नहीं, बल्कि भाव है, जो हृदय से हृदय को जोड़ती है और हमारी संस्कृति, संस्कार एवं संवेदना की जीवंत अभिव्यक्ति है।

श्रीमद् जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी का यह 726वाँ प्राकट्य महोत्सव प्रयागराज संगम तट पर एक ऐतिहासिक अध्याय के रूप में अंकित हुआ, जिसने श्रद्धालुओं के हृदयों को आलोकित करने के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से पुनः जोड़ने का प्रेरणास्रोत प्रदान किया।

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