दैवी युग का अवसान: महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज का देवलोक गमन
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन परिवार आज अत्यंत वेदना, पीड़ा, शोक और अपार विरह से व्यथित है। परम विद्वान, परम वीतराग, परम वैरागी, प्रातः स्मरणीय महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज के दिव्य देवलोक गमन ने सम्पूर्ण संत समाज, दैवी सम्पद् मंडल, परमार्थ निकेतन परिवार और समस्त सनातन जगत को शोकाकुल कर दिया है। उनके कृपा-दर्शन और प्रेरणा से एक दिव्य युग जीवित था, जिसका आज अवसान हो गया।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज ने विरहपूर्ण कंठ में कहा, “आज दैवी सम्पद् मंडल के एक युग का अंत हो गया। पूज्य स्वामी असंगानन्द जी का जाना वास्तव में एक परम्परा का विराम है।”
उन्होंने स्वामी असंगानन्द जी को अद्वितीय तपस्वी, तेजस्वी, गंभीर, अंतर्दर्शी और विलक्षण कर्मयोगी बताते हुए कहा कि वे केवल संन्यास परम्परा के ध्वजवाहक नहीं थे, बल्कि सेवा, त्याग, सहिष्णुता और ज्ञान की जीवित मूर्ति थे।
गंगा आरती में भावपूर्ण श्रद्धांजलि
परमार्थ निकेतन की विश्वविख्यात गंगा आरती पूर्णतः उनके श्रीचरणों को समर्पित रही। देशभर से पहुँचे संतों, महंतों, महामण्डलेश्वरों, आचार्यों, परमार्थ गुरुकुल ऋषिकुमारों और समूचे परमार्थ परिवार ने उन्हें वंदन-नमन कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्रद्धांजलि देने वालों में प्रमुख रूप से—
चिन्नमयानन्द सरस्वती जी महाराज (मुमुक्ष आश्रम शाहजहांपुर)
महंत रविन्द्र पुरी जी महाराज (सचिव, महानिर्वाणी अखाड़ा)
ज्योतिर्मयानन्द सरस्वती जी महाराज (रायबरेली आश्रम)
महामण्डलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द जी महाराज (हरिद्वार)
महामण्डलेश्वर स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज (अमर प्रेम आश्रम)
महामण्डलेश्वर स्वामी विवेकानन्द सरस्वती जी महाराज (आनन्द धाम हरिद्वार)
स्वामी सत्यव्रतानन्द सरस्वती जी महाराज (योगानन्द योग फाउंडेशन)
महामण्डलेश्वर गौ ऋषि स्वामी ज्ञान स्वरूपानन्द अक्रिय जी महाराज
स्वामी हरिहरानन्द जी महाराज, स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज, साध्वी भगवती सरस्वती जी, स्वामी गंगेश्वरानन्द जी
संत समाज ने उन्हें “अखंड तपश्चर्या, दिव्य ज्ञान और शुचिता के ध्रुवतारा” के रूप में स्मरण किया।
सनातन परम्परा के दीप्तिमान स्तंभ
पूज्य स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन सनातन परम्परा, संन्यास मर्यादा, अद्वैत ज्ञान, शास्त्र-अध्ययन और आध्यात्मिक तप के लिए अर्पित कर दिया। वे मृदुभाषी होते हुए भी गहनतम ज्ञान के धनी थे। उनकी मौन-वाणी तक साधकों के लिए उपदेश बन जाती थी।
उनके तेज में तप, वाणी में वेद और हृदय में अपार करुणा थी। उन्होंने हजारों साधकों के जीवन में स्थिरता, शांति और ईश्वर-भक्ति का प्रकाश जगाया। संत समाज ने कहा कि “संत कभी जाते नहीं, वे केवल रूप बदलते हैं। पूज्य स्वामी जी का तेज और उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहेगा।”
सामुदायिक श्रद्धांजलि और बाजार बंद
स्वर्गाश्रम एवं रामझूला बाजार बंद रखकर स्थानीय नागरिकों ने भी पूज्य स्वामी जी को श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्वामी शुकदेवानन्द ट्रस्ट के ट्रस्टी वी.के. माहेश्वरी, रमन अरोड़ा, साध्वी आभा सरस्वती, रामानन्त तिवारी, योगाचार्य विमल बधावन, अरुण सारस्वत, परमार्थ गुरुकुल के आचार्यगण एवं समस्त ऋषिकुमारों ने उनके श्रीचरणों में नमन कर उनकी शिक्षाओं को जीवन में धारण करने का संकल्प लिया।
पूज्य स्वामी जी महाराज का दिव्य आशीष और उनके द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक विरासत सदैव मार्गदर्शन करती रहेगी।
ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
