12 साल की उम्र से जनसंघर्ष की राह पर डॉ. शक्तिशैल कपरवाण, आज भी जारी है जनता के हक की लड़ाई
बाल युवक मंगलदल से शुरू हुआ सफर, पृथक उत्तराखंड के लिए जेल और आमरण अनशन तक पहुंचे; सड़क-पुल से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन तक संघर्षों की लंबी फेहरिस्त
पौड़ी। उम्र महज 12 वर्ष थी, लेकिन सोच गांव और समाज की थी। हाथों में न कोई राजनीतिक झंडा था, न किसी बड़े मंच का सहारा—बस अपने गांव को बेहतर बनाने का संकल्प था। छुट्टी के दिन गांव के रास्तों की सफाई और मरम्मत के लिए बच्चों और युवाओं को साथ जुटाने से शुरू हुआ डॉ. शक्तिशैल कपरवाण का सफर आगे चलकर उत्तराखंड आंदोलन, जेल, आमरण अनशन, सड़क और पुल के लिए जनसंघर्ष तथा भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन तक पहुंचा। बचपन से शुरू हुई यह संघर्ष यात्रा आज भी थमी नहीं है।

किशोरावस्था में ही उन्होंने अपने गांव में बाल युवक मंगलदल का गठन किया। छुट्टी के दिनों में युवाओं को साथ लेकर रास्तों की मरम्मत, साफ-सफाई और अन्य सामुदायिक कार्य किए। महज 16 वर्ष की उम्र में रामलीला समिति के अध्यक्ष बने। छोटी उम्र में मिली ये जिम्मेदारियां आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की बुनियाद बनीं।
1973 में अलग पर्वतीय राज्य के लिए उठाया कदम
पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा और अलग राज्य की मांग को लेकर जब पहाड़ में जनचेतना आकार ले रही थी, तब डॉ. कपरवाण ने भी आंदोलन की राह पकड़ी।
वर्ष 1973 में पृथक पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की मांग को लेकर उत्तराखंड वाहिनी की स्थापना की। बाद में उत्तराखंड वाहिनी का उत्तराखंड क्रांति दल में विलय हुआ। अलग राज्य की मांग को लेकर उन्होंने कई आंदोलनों में भाग लिया, जेल गए और आमरण अनशन तक किया।
उत्तराखंड राज्य बनने तक वे अलग राज्य की मांग को लेकर लगातार जनसंघर्ष में सक्रिय रहे।
लेकिन राज्य बनने के बाद भी उनके लिए संघर्ष खत्म नहीं हुआ।
उनका कहना रहा है कि जिस उत्तराखंड की कल्पना जनभावनाओं और आंदोलन के शहीदों ने की थी, मौजूदा उत्तराखंड उस भावना के अनुरूप नहीं बन पाया। इसी सोच के साथ वे आज भी उत्तराखंड के मूल सवालों और जनभावनाओं को लेकर संघर्षरत हैं।
कौड़िया-किमसार सड़क के लिए कानून से टकराने तक का फैसला
यमकेश्वर क्षेत्र में सड़क की मांग को लेकर उनका संघर्ष भी उल्लेखनीय रहा। कौड़िया-किमसार मोटर मार्ग के निर्माण में बाधक पेड़ों को हटाने के लिए करीब 14 किलोमीटर क्षेत्र में ग्रामीणों के साथ आंदोलन किया गया।
आपके अनुसार, सड़क निर्माण के लिए बाधक पेड़ों को कटवाने के मामले में दर्ज मुकदमों की जिम्मेदारी डॉ. कपरवाण ने अपने ऊपर ली।
यह संघर्ष इस सवाल को लेकर था कि जिन ग्रामीणों के लिए सड़क जीवनरेखा है, उन्हें विकास की बुनियादी सुविधा के लिए आखिर कितने वर्षों तक इंतजार करना पड़ेगा।
बीन नदी पुल के लिए बार-बार धरना-प्रदर्शन
सड़क के साथ ही बीन नदी पुल का मुद्दा भी उनके लंबे जनसंघर्षों में शामिल रहा। पुल निर्माण की मांग को लेकर कई बार धरना-प्रदर्शन किए गए।
पुल को लेकर आंदोलन का मकसद सिर्फ आवागमन आसान करना नहीं था। ग्रामीणों के लिए यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बाजार और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सवाल था।
हजारों किलोमीटर की यात्रा, जनजागरण को बनाया हथियार
वर्ष 1973 से अब तक हजारों किलोमीटर की यात्रा करने का दावा करते हुए डॉ. कपरवाण ने पर्वतीय क्षेत्रों के जनसरोकारों को लेकर लगातार जनजागरण किया।
कई बार आमरण अनशन किए। आंदोलनों में भाग लिया। धरने-प्रदर्शन किए और ग्रामीणों की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास किया।
उनकी राजनीति का केंद्र सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर सवाल खड़े करना रहा—यही उनके समर्थक उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी पहचान बताते हैं।
लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग की लड़ाई में भी रहे सक्रिय
कोटद्वार क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग को लेकर भी डॉ. कपरवाण ने लंबे समय तक संघर्ष किया। धरने, प्रदर्शन और जनजागरण के माध्यम से उन्होंने इस मुद्दे को जनता के बीच उठाया।
इस मार्ग को लेकर लंबे समय से चल रही मांग को मजबूत जनांदोलन का रूप देने में उनके प्रयासों को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसके साथ ही कोटद्वार-कालागढ़ मार्ग के लिए भी वे संघर्षरत रहे हैं।
यानी सड़क का सवाल उनके लिए महज निर्माण का विषय नहीं रहा, बल्कि यह पहाड़ और मैदानी क्षेत्रों के बीच बेहतर संपर्क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास से जुड़ा मुद्दा रहा है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ
डॉ. कपरवाण के जनसंघर्षों की फेहरिस्त में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी महत्वपूर्ण अध्याय है।
वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़े और वर्ष 2018 तक आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। इसी दौरान भ्रष्टाचार और जनलोकपाल की मांग को लेकर देशभर में आंदोलन हुए।
अन्ना हजारे के साथ उनके संपर्क और आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का सिलसिला आगे भी जारी रहा। वर्ष 2018 में ऋषिकेश में अन्ना हजारे के साथ बैठक भी हुई।
जब अन्ना हजारे ने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन किया, तब डॉ. कपरवाण भी दिल्ली पहुंचकर आंदोलन में मौजूद रहे। दिल्ली में अन्ना हजारे के दो अनशन के दौरान उनकी मौजूदगी रही।
उत्तराखंड लौटकर भी उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज को स्थानीय स्तर पर उठाया और कोटद्वार में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में भाग लिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी पुरानी
डॉ. कपरवाण की भ्रष्टाचार विरोधी सक्रियता को केवल अन्ना आंदोलन से जोड़कर नहीं देखा जाता। उनका कहना रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई उनके सार्वजनिक जीवन के शुरुआती दौर से ही उनके सरोकारों में शामिल रही है।
उनके लिए भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वतखोरी का सवाल नहीं, बल्कि जनता के अधिकार, सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और विकास के लाभ को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का सवाल है।
जनआंदोलन ही बना पहचान
डॉ. शक्तिशैल कपरवाण के सार्वजनिक जीवन की सबसे खास बात यह है कि उनके संघर्षों का भूगोल लगातार व्यापक होता गया।
गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ सफर उत्तराखंड आंदोलन तक पहुंचा। उत्तराखंड आंदोलन से सड़क-पुल के संघर्षों तक गया। सड़क-पुल के मुद्दों से जल-जंगल-जमीन के सवाल जुड़े और फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन तक उनकी सक्रियता पहुंची।
लेकिन हर पड़ाव पर केंद्र में जनता रही।
आज भी जारी है संघर्ष
उत्तराखंड बन गया, लेकिन डॉ. कपरवाण के लिए आंदोलन खत्म नहीं हुआ। उनका कहना है कि जिस उत्तराखंड की कल्पना आंदोलनकारियों और शहीदों ने की थी, वह अभी अधूरा है।
इसी अधूरे सपने को पूरा करने और जनभावनाओं के अनुरूप उत्तराखंड के निर्माण के लिए वे आज भी संघर्षरत हैं।
आज भी सड़क, रोजगार, पलायन, जल-जंगल-जमीन, क्षेत्रीय विकास, भ्रष्टाचार और जनता के अधिकारों जैसे सवालों पर उनकी सक्रियता बनी हुई है।
12 साल की उम्र में गांव के रास्तों की सफाई से शुरू हुआ सफर आज भी जनता के अधिकारों की लड़ाई तक पहुंचा हुआ है।
जेल गए, अनशन किया, सड़क पर उतरे—लेकिन संघर्ष नहीं छोड़ा
डॉ. शक्तिशैल कपरवाण के सार्वजनिक जीवन को अगर कुछ शब्दों में समेटना हो तो शायद यही कहा जा सकता है—
“मुद्दे बदलते रहे, आंदोलन बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन संघर्ष की राह नहीं बदली।”
1973 से शुरू हुआ जनजागरण का सफर हो या आज का दौर—उनकी राजनीति और सार्वजनिक सक्रियता का केंद्र जनता के सवाल रहे हैं।
और यही वजह है कि डॉ. शक्तिशैल कपरवाण की संघर्षगाथा को केवल अतीत की कहानी नहीं कहा जा सकता। यह संघर्ष आज भी जारी है।
