श्रावण के प्रथम सोमवार पर परमार्थ निकेतन में हुआ दिव्य रुद्राभिषेक
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कांवड़ यात्रियों से शांति, अनुशासन और सद्भाव के साथ यात्रा करने का किया आह्वान
ऋषिकेश। श्रावण मास के प्रथम सोमवार पर परमार्थ निकेतन में श्रद्धा, भक्ति और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिव का दिव्य रुद्राभिषेक किया गया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती के सान्निध्य में परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने वैदिक परंपरा के अनुसार रुद्राभिषेक एवं विश्व शांति यज्ञ संपन्न कराया। इस दौरान श्रीरुद्रम और महामृत्युंजय मंत्रों के पाठ से पूरा वातावरण शिवमय हो गया।

भगवान शिव का गंगाजल, दुग्ध, दधि, घृत, मधु, शर्करा, बिल्वपत्र एवं पुष्पों से अभिषेक कर विश्वशांति, पर्यावरण संरक्षण, मानव कल्याण एवं समस्त प्राणियों के मंगल की कामना की गई। इस अवसर पर ‘शिवाभिषेक के साथ धराभिषेक’ का संदेश भी दिया गया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कांवड़ यात्रियों से अपील की कि भगवान शिव को जल अर्पित करने के लिए आने वाले श्रद्धालु अपनी यात्रा श्रद्धा, शांति और अनुशासन के साथ पूरी करें। उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का हंगामा, हुड़दंग या हिंसा न हो। “शिवोऽहम्, शिवोऽहम् का जप करते हुए आगे बढ़ें। शोर नहीं, शांति का संदेश दें और आक्रोश नहीं, आस्था का परिचय दें।”
उन्होंने कहा कि भोले बाबा के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण के साथ कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की आस्था सनातन संस्कृति की बड़ी शक्ति है। यही आस्था समाज में प्रेम, सेवा, सद्भाव और शिवत्व के मार्ग को मजबूत करती है।
स्वामी जी ने कहा कि श्रावण आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मजागरण का पर्व है। यह केवल बाहरी पूजा का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित शिवतत्व को जागृत करने की यात्रा है। “श्रावण, मौन से महादेव तक और स्वयं से शिव तक की यात्रा है।”
उन्होंने कहा कि भगवान शिव त्याग, करुणा, धैर्य, संतुलन और समरसता के प्रतीक हैं। शिव का जीवन-दर्शन वर्तमान समय की पर्यावरणीय चुनौतियों, मानसिक तनाव, हिंसा और असहिष्णुता जैसी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। मनुष्य अपने भीतर करुणा, संयम और सहिष्णुता विकसित कर परिवार, समाज और विश्व में शांति का वातावरण बना सकता है।
युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि श्रावण का वास्तविक व्रत अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली को पवित्र बनाना है। क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता का त्याग कर प्रेम, सेवा और संवेदना को जीवन में अपनाना ही भगवान शिव की सच्ची आराधना है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव प्रकृति के आदि योगी हैं। उनकी पूजा तभी पूर्ण होगी, जब नदियों को स्वच्छ रखने, वृक्षों का संरक्षण करने, जल का सम्मान करने और धरती माता की सेवा का संकल्प लिया जाए। पर्यावरण संतुलन और हरित धरती ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है।
समापन पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने श्रद्धालुओं से श्रावण मास को सेवा, साधना और संस्कार का महापर्व बनाने का आह्वान किया। उन्होंने प्रतिदिन ध्यान, जप, मौन, योग, प्रार्थना और निःस्वार्थ सेवा के लिए समय निकालने के साथ ‘मोबाइल फास्टिंग’ का संकल्प लेने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि मोबाइल से कुछ समय दूरी बनाकर स्वयं से जुड़ने पर जीवन में शांति, संतुलन और शिवत्व का अनुभव किया जा सकता है। अंत में उन्होंने भगवान शिव से सभी के सुख, शांति, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि एवं विश्व कल्याण की प्रार्थना की।
