केवल 2 घंटे 40 मिनट में समाप्त हुआ उत्तराखंड विधानसभा का मानसून सत्र
भराड़ीसैंण (गैरसैण)। चार दिन तक चलने वाला प्रस्तावित उत्तराखंड विधानसभा का मानसून सत्र महज डेढ़ दिन में ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी तकरार और लगातार हंगामे के चलते यह सत्र मात्र 2 घंटे 40 मिनट की कार्यवाही तक ही सीमित रह गया।

विपक्ष का हंगामा
सत्र के दौरान विपक्ष ने बेरोजगारी, महंगाई, आपदा प्रबंधन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार जनता से जुड़े गंभीर सवालों पर चर्चा से बच रही है और संवेदनशील विषयों को टाल रही है।
सत्ता पक्ष का पलटवार
वहीं सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उन्होंने बार-बार हंगामा कर कार्यवाही बाधित की। सत्ता पक्ष का कहना था कि सरकार सभी विषयों पर चर्चा को तैयार थी, लेकिन विपक्ष ने संवाद के बजाय शोर-शराबे का रास्ता चुना।
विधानसभा अध्यक्ष की टिप्पणी
विधानसभा अध्यक्ष ने सत्र को स्थगित करते हुए खेद जताया कि विपक्ष के व्यवहार के कारण किसी भी विषय पर गंभीर चर्चा संभव नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि जनता से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श का अवसर अधूरा रह गया।
अधूरे रह गए जनता के मुद्दे
चार दिन के लिए प्रस्तावित यह सत्र जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति
किसानों की समस्याएं
रोजगार सृजन
स्वास्थ्य सुविधाएं
शिक्षा से जुड़े प्रश्न
इन सभी अहम विषयों पर चर्चा अधूरी ही रह गई।
बड़ा सवाल
क्या जनता के हितों से जुड़े मुद्दों को दरकिनार कर सत्र को जल्दबाजी में स्थगित करना न्याय है?
विपक्ष सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो सत्ता पक्ष विपक्ष के हंगामे को दोषी बता रहा है।
गैरसैण में सत्र आयोजित करने पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन हंगामे के कारण जब जनहित पर चर्चा ही नहीं हो पाती तो यह परंपरा जनता के साथ अन्याय प्रतीत होती है।
जनप्रतिनिधि सैर-सपाटा कर लौट आते हैं और जनहित के सवाल अधूरे रह जाते हैं।
अब सवाल है कि क्या हंगामे की इस परंपरा को बदलने के लिए सख्त कानून नहीं बनना चाहिए?
