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पर्वतीय गांधी: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के जनक स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी

(पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन)

उत्तराखंड राज्य आंदोलन का नाम लेते ही जो व्यक्तित्व सबसे पहले स्मृति पटल पर उभरता है, वह है स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी। उन्हें सम्मानपूर्वक “पर्वतीय गांधी” कहा गया। बडोनी जी ने न केवल उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की संकल्पना दी बल्कि अपने जीवनभर पर्वतीय समाज की अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे।

स्व. इंद्रमणि बडोनी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को टिहरी गढ़वाल जनपद के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के अखोडी गांव में हुआ था। एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे बडोनी जी बचपन से ही सरल, जिज्ञासु और संघर्षशील प्रवृत्ति के थे। माता-पिता ने उन्हें नैतिकता और परिश्रम की शिक्षा दी, जिसने आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की नींव रखी।

शिक्षा और आजीविका

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई देहरादून व टिहरी में की। संस्कृत, लोक संस्कृति और भारतीय इतिहास में गहरी रुचि के कारण उन्होंने अध्यापन का कार्य भी किया। साथ ही लोककला, लोकनृत्य और लोकसंस्कृति को बचाने के लिए वे लगातार सक्रिय रहे।

सामाजिक कार्य और जनप्रतिनिधित्व

इंद्रमणि बडोनी जी ने अपना जीवन सामाजिक कार्यों को समर्पित किया। वे लोकसभा एवं उत्तर प्रदेश विधान सभा दोनों के सदस्य रहे। विधायक रहते हुए भी उन्होंने सदैव पर्वतीय जनमानस के प्रश्नों को उठाया। उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम माना और व्यक्तिगत लाभ से हमेशा दूर रहे।

पृथक पर्वतीय राज्य की अवधारणा

सन् 1970 के दशक में उन्होंने पहली बार पृथक पर्वतीय राज्य का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया। उनका कहना था:

“पर्वतीय जनमानस की समस्याएँ मैदानों के लिए कभी प्राथमिकता नहीं हो सकतीं। यदि हमारे पहाड़ को बचाना है तो हमें अलग राज्य की मांग करनी ही होगी।”

उनका यह दृष्टिकोण आगे चलकर आंदोलन की नींव बना।

आंदोलन की शुरुआत और 1994 से पहले का स्वरूप

प्रारंभ में आंदोलन शांतिपूर्ण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से आगे बढ़ा। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जब पर्वतीय समाज को लगा कि उनकी आवाज़ और दबा दी गई है, तो यह आंदोलन तेज़ हुआ। 1980 और 1990 के दशक में जनसभाओं, धरनों और प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो चुका था।

1994 का आंदोलन – निर्णायक मोड़

साल 1994 ने आंदोलन को अभूतपूर्व गति दी।

खटीमा गोलीकांड (1 सितंबर 1994) में कई आंदोलनकारी शहीद हुए।

मसूरी गोलीकांड (2 सितंबर 1994) ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया।

पौड़ी की भूख हड़ताल (अगस्त 1994) – इंद्रमणि बडोनी अपने साथियों के साथ पौड़ी में अनशन पर बैठे। यहाँ उन्होंने कहा था:

“हम भूखे रह लेंगे, लेकिन अपने पहाड़ों की आत्मा को मरने नहीं देंगे।”

यह भूख हड़ताल आंदोलन का निर्णायक मोड़ बनी। यहाँ से आंदोलन ने स्थानीय स्तर से निकलकर जन-जन का आंदोलन रूप धारण कर लिया।

रामपुर तिराहा कांड (2 अक्टूबर 1994), जहाँ दिल्ली में संसद भवन घेराव करने जा रहे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज और गोलीबारी हुई, ने आंदोलन को राष्ट्रीय पटल पर ला दिया।

देहरादून और होली कांड की घटनाओं ने आंदोलन की ज्वाला को और भड़काया।

इन घटनाओं ने पूरे उत्तराखंड को आंदोलित कर दिया और पृथक राज्य की माँग अटल हो गई।

संसद भवन घेराव (2 अक्टूबर 1994)

दिल्ली कूच के दौरान हजारों आंदोलनकारी शांतिपूर्ण तरीके से संसद भवन का घेराव करने जा रहे थे। लेकिन रामपुर तिराहा में जिस तरह उन्हें रोका गया, उससे आंदोलन राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना और उत्तराखंड राज्य की मांग को अनदेखा करना असंभव हो गया।

आंदोलनकारियों की स्मृतियाँ

आंदोलन में शामिल कई कार्यकर्ताओं की यादें आज भी ज़िंदा हैं। एक आंदोलनकारी ने कहा था:

“जब बडोनी जी पौड़ी में भूख हड़ताल पर बैठे थे, तो गाँव-गाँव से महिलाएँ और बुजुर्ग उनके लिए पानी लेकर आते थे। लोग कहते – बडोनी जी तुम मत घबराना, पहाड़ तुम्हारे साथ है।”

इसी सामूहिक विश्वास ने आंदोलन को घर-घर तक पहुँचा दिया।

राज्य की प्राप्ति और बडोनी जी का निधन

दुर्भाग्यवश, उत्तराखंड राज्य बनने से मात्र कुछ महीने पहले ही, 18 अगस्त 2000 को स्व. इंद्रमणि बडोनी का निधन हो गया। 9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) एक अलग राज्य बना, तब “पर्वतीय गांधी” हमारे बीच नहीं थे।

क्या शहीदों और बडोनी जी के सपनों का उत्तराखंड बना?

आज यह प्रश्न हम सबके सामने है। क्या यह राज्य वही बना जिसकी कल्पना बडोनी जी और आंदोलनकारियों ने की थी?

क्या पलायन रुका?

क्या गाँव समृद्ध हुए?

क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के अवसर हर पहाड़ी तक पहुँचे?

उत्तर अभी अधूरा है। निश्चित ही कुछ उपलब्धियाँ हुईं, लेकिन अपेक्षाओं और सपनों से हम अभी दूर हैं।

निष्कर्ष

स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी जी ने अपना जीवन पर्वतीय जनमानस को समर्पित कर दिया। उन्होंने हमें यह सिखाया कि आंदोलन सिर्फ सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को बदलने के लिए होते हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संकल्प लें कि हम शहीदों और बडोनी जी के सपनों का उत्तराखंड बनाने की दिशा में मिलकर काम करेंगे।

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