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देवभूमि में संस्कृत दीप का पुनः प्रज्वलन

उत्तराखण्ड में आदर्श संस्कृत ग्राम योजना, संस्कृत सप्ताह और गृह-गृह संस्कृत अभियान

लेखक – विजेन्द्र प्रसाद ममगाईं

अध्यक्ष, उत्तराखण्ड विद्वत सभा

उत्तराखण्ड — सहस्राब्दियों से संस्कृत अध्ययन, वैदिक परम्परा और ऋषि-आश्रमों की पवित्र भूमि रहा हैं । आज पुनः संस्कृत दीप को प्रज्वलित कर रहा है। राज्य सरकार, सामाजिक संस्थाओं और संस्कृतप्रेमियों के संयुक्त प्रयासों से संस्कृत केवल मंदिरों या पाठशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि गाँव-गाँव और घर-घर में जीवन का अभिन्न अंग बन रही है। हाल ही में राज्य के तेरह आदर्श संस्कृत ग्रामों का शुभारम्भ, उसके बाद संस्कृत सप्ताह के अंतर्गत संवाद गोष्ठी, तथा “गृह-गृह संस्कृत” अभियान के अंतर्गत संस्कृत दिवस समारोह हैं । ये सभी घटनाएँ संस्कृत संवर्धन के स्वर्णिम पृष्ठ लिख रही हैं।

आदर्श संस्कृत ग्रामों का शुभारम्भ

देहरादून के भोगपुर गाँव से मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने तेरह जिलों में तेरह आदर्श संस्कृत ग्रामों का उद्घाटन किया। प्रत्येक ग्राम में संस्कृत भवन का निर्माण, सरकारी प्राथमिक संस्कृत विद्यालय की स्थापना, और दैनन्दिन जीवन में संस्कृत के व्यवहारिक प्रयोग को प्रोत्साहन — यही इस योजना का लक्ष्य है।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि “उत्तराखण्ड पहला राज्य है जिसने संस्कृत संवर्धन के लिए ऐसी योजना प्रारम्भ की है। संस्कृत केवल ग्रन्थों, वेदों और उपनिषदों की भाषा नहीं है; यह हमारी संस्कृति, परम्परा, विज्ञान, दर्शन और नैतिक मूल्यों की आधारशिला है।”

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी शिक्षा नीति में संस्कृत के आधुनिक और व्यवहारिक स्वरूप को स्थापित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। डिजिटल माध्यम से संस्कृत साहित्य का प्रसार, ई-संस्कृत शिक्षण मंच, संस्कृत ऐप्स और संसदीय कार्यवाही का संस्कृत में अनुवाद — इससे संस्कृत समयानुकूल रूप में विकसित हो रही है।

संवाद गोष्ठी — “समाज में संस्कृत विषयक धारणा”

८ अगस्त को संस्कृत भारती देहरादून और शिव मंदिर प्रबन्धन समिति, चन्द्र मार्ग के संयुक्त तत्वावधान में संवाद गोष्ठी आयोजित हुई। विषय था — “समाज में संस्कृत विषयक धारणा”।

मुख्य वक्ता श्री नागेन्द्र दत्त व्यास ने कहा — “यदि हम अपनी संस्कृति, इतिहास और मूल्यों को जानना चाहते हैं, तो संस्कृत को केवल पाठ्य विषय के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में अपनाना होगा।”

सभा के अध्यक्ष डॉ. रामभूषण विजल्वाण ने “शब्दो वै ब्रह्म” का उल्लेख करते हुए संस्कृत के दिव्य स्वरूप को प्रतिपादित किया। हमने “संस्कृत केवल कर्मकाण्ड की भाषा नहीं, बल्कि साहित्य, विज्ञान और नीति शास्त्र में भी अनुपम माना हैं।”

इस आयोजन में यह स्पष्ट हुआ कि दैनन्दिन जीवन में संस्कृत के प्रयोग का पुनः प्रवर्तन ही उसे जनभाषा के रूप में स्थापित करने का श्रेष्ठ मार्ग है।

“गृह-गृह संस्कृत” — संस्कृत दिवस समारोह

९ अगस्त को बंजारावाला में, संस्कृत भारती देहरादून ने सनातन धर्म मंदिर समिति के सहयोग से संस्कृत दिवस समारोह आयोजित किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. प्रदीप सेमवाल ने संस्कृत भारती की कार्यपद्धति और संस्कृत सप्ताह के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि श्री राम प्रसाद सेमवाल और विशिष्ट अतिथि श्री विशाल प्रसाद भट्ट ने उपस्थित जनों को व्यवहारिक संस्कृत संभाषण सिखाया।

श्लोक पाठ, गीत प्रस्तुति, संस्कृत संभाषण प्रदर्शन, पुष्प अर्पण और संकल्प ग्रहण — इन सबने कार्यक्रम को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।

सभी उपस्थितजन “मेरी भाषा संस्कृत है” के संकल्प के साथ लौटे, और निश्चय किया कि घर-घर में संस्कृत दीप जलाएँगे।

श्रावणी उपाकर्म और संस्कृत दिवस — टपकेश्वर महादेव मंदिर ९ अगस्त को ही गढ़ी कैण्ट क्षेत्र के टपकेश्वर महादेव मंदिर में श्रावणी उपाकर्म वैदिक विधि से सम्पन्न हुआ। आचार्य मन्त्री प्रसाद थपलियाल के नेतृत्व में दश विधि स्नान, तर्पण, संध्या पूजन, ऋषि पूजन, यज्ञ अनुष्ठान सम्पन्न हुआ।

कई बटुक ब्रह्मचारियों का उपनयन संस्कार भी हुआ। यज्ञोपवीत धारण के साथ वेदाध्ययन दीक्षा दी गई, और संस्कृत भाषा, वैदिक परम्परा तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण में इस संस्कार के महत्व को विस्तार से बताया गया।

अन्त में श्री विशाल प्रसाद भट्ट ने संस्कृत दिवस पर विशेष व्याख्यान दिया, जिससे उपस्थितों में संस्कृत प्रेम और श्रद्धा जाग्रत हुई।

संयुक्त परिणाम और भविष्य दृष्टि

ये सभी प्रयास सरकार की आदर्श संस्कृत ग्राम योजना, सामाजिक संस्थाओं की संवाद गोष्ठी, संस्कृत भारती का “गृह-गृह संस्कृत” अभियान, और श्रावणी उपाकर्म — एक ही सूत्र में बँधे हैं: संस्कृत का पुनरुत्थान, पुनः व्यवहार में प्रवर्तन, और आने वाली पीढ़ियों में संस्कृताभिमुखता का विकास।

संस्कृत केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि समाज की हृदयधारा, विचारों की प्रेरणा और राष्ट्र की आत्मा है। यदि हम इस मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलते रहें, तो निकट भविष्य में उत्तराखण्ड केवल “देवभूमि” ही नहीं, बल्कि “संस्कृत भूमि” के रूप में भी प्रसिद्ध होगा।

आज, जब मैं उत्तराखण्ड विद्वत सभा के अध्यक्ष के रूप में इन सभी आयोजनों को देखता हूँ, तो मेरा हृदय आनंद और गर्व से भर जाता है। गाँव-गाँव संस्कृत दीप जले, विद्यालय-विद्यालय संस्कृत ध्वनि गूँजे, और जन-जन का जीवन संस्कृतमय बने — यही मेरी प्रार्थना और प्रतिज्ञा है।

 

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