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हेंवल नदी किनारे अंधाधुंध निर्माण: मोहनचट्टी मौत के मुहाने पर

*नियम कानून बने बौने, अतिक्रमण बेखौफ। धराली जैसी त्रासदी की आहट।*

यमकेश्वर। हेंवल नदी के किनारे बसा मोहनचट्टी और इसके आसपास का इलाका आज प्रकृति और मानव लापरवाही के बीच टकराव का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। जिस भूभाग को कभी हरा-भरा वन, शांत जलधारा और खुले तटों के लिए जाना जाता था, आज वहां कंक्रीट के जंगल उग आए हैं।

2013 की आपदा से कोई सबक नहीं

साल 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण आपदा ने हेंवल नदी किनारे बसे क्षेत्रों को भी नहीं छोड़ा। उस समय अतिवृष्टि और अचानक आई बाढ़ ने मोहनचट्टी के आसपास कई होटल, कैंप और पुल बहा दिए थे। स्थानीय लोग, पर्यटक और प्रशासन – सभी ने तब इस क्षेत्र में सुरक्षित और नियंत्रित विकास की जरूरत महसूस की थी। लेकिन अफसोस, कुछ ही सालों में यह चेतावनी हवा हो गई और फिर से वही पुरानी गलती दोहराई जाने लगी।

नदी की जमीन पर कब्ज़ा

हेंवल नदी के दोनों किनारों और बैरागढ़ से आने वाले गधेरे के मुहाने पर बड़े पैमाने पर होटल, रिजॉर्ट और कैंप बनाए जा रहे हैं। कई जगह तो नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र (फ्लड प्लेन) को पाटकर निर्माण किया गया है। यह न केवल अवैध है बल्कि नदी के प्रवाह को बाधित करने और आपदा का खतरा बढ़ाने वाला कदम भी है।

कानून और नियम ताक पर

उत्तराखंड में नदियों के किनारे निर्माण को लेकर कई नियम-कायदे हैं — जैसे

नदी के दोनों तरफ से कम से कम 200 मीटर की दूरी पर स्थायी निर्माण न करना।

बाढ़ प्रवण क्षेत्र में किसी भी प्रकार की संरचना से पहले भू-वैज्ञानिक और पर्यावरणीय अनुमति लेना।

लेकिन मोहनचट्टी क्षेत्र में ये सभी नियम बौने साबित हो रहे हैं। या तो निर्माण बिना अनुमति के हो रहे हैं या अनुमति में नियमों की अनदेखी की जा रही है।

धराली की पुनरावृत्ति का खतरा

हाल ही में उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा में नदी किनारे बने होटल और दुकानों के ध्वस्त होने की तस्वीरें पूरे देश ने देखीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मोहनचट्टी और आसपास के क्षेत्रों में भी हालात धराली से अलग नहीं हैं। यदि भारी बारिश या बादल फटने जैसी घटना यहां होती है, तो नुकसान उतना ही भयावह हो सकता है।

स्थानीय पर्यावरण और आजीविका पर असर

जल-प्रदूषण: होटल और कैंप से निकलने वाला अपशिष्ट सीधे नदी में गिर रहा है, जिससे जल-गुणवत्ता बिगड़ रही है।

जैव-विविधता पर खतरा: नदी किनारे के वन क्षेत्र में कटाई और भूमि परिवर्तन से पक्षियों और जलजीवों का आवास नष्ट हो रहा है।

स्थानीय ग्रामीणों की सुरक्षा: आपदा की स्थिति में सबसे पहले प्रभावित स्थानीय लोग होंगे, जिनके पास बचाव के साधन सीमित हैं।

क्या होना चाहिए

1. तत्काल सर्वेक्षण और निरीक्षण: सरकार को हेंवल नदी किनारे सभी निर्माणों का भू-अभिलेख, पर्यावरणीय प्रभाव और सुरक्षा मानकों के आधार पर आकलन करना चाहिए।

2. अवैध निर्माण पर रोक: नियमों के विपरीत बने ढांचों को हटाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।

3. नदी किनारे हरित पट्टी: बाढ़ प्रवण क्षेत्र को फिर से प्राकृतिक हरियाली में बदलना जरूरी है।

4. आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण: स्थानीय समुदाय को आपदा के समय त्वरित प्रतिक्रिया देने का प्रशिक्षण देना चाहिए।

निष्कर्ष:

मोहनचट्टी का आज का दृश्य एक चेतावनी है कि यदि हमने 2013 की तरह प्रकृति के संकेतों को अनदेखा किया, तो अगली त्रासदी केवल समय की बात है। धराली में जो हुआ, वह यहां भी हो सकता है — और शायद उससे भी बड़े पैमाने पर। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो नदी, पहाड़ और मानव – तीनों की सुरक्षा के साथ तालमेल में हो।

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