बाबा मोहन उत्तराखंडी – एक संकल्प, एक बलिदान, एक अमर कथा
मातृभूमि के लिए जीवन समर्पित करने वाले अमर बलिदानी
उत्तराखंड के इतिहास में कई ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्होंने अपने सपनों के उत्तराखंड के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इन्हीं अमर बलिदानियों में से एक हैं बाबा मोहन उत्तराखंडी, जिनका जीवन, संघर्ष और बलिदान नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

परिचय : गांव बंठोली, एकेश्वर ब्लॉक, पौड़ी गढ़वाल की शांत वादियों में जन्मा एक साधारण युवक…
पर मन में था असाधारण जज़्बा।
नाम था मोहन सिंह, लेकिन पहाड़ और अपने लोगों के लिए किए गए त्याग ने उन्हें बना दिया – बाबा मोहन उत्तराखंडी।
रामपुर तिराहा से जागा विद्रोह
1994 का रामपुर तिराहा कांड सिर्फ एक घटना नहीं थी, वह पहाड़ के दिल में गहरा घाव था। आंदोलनकारियों पर गोलियां, अपमान और निर्दयी दमन ने बाबा मोहन का दिल तोड़ दिया।
उन्होंने भारतीय सेना में क्लर्क की नौकरी छोड़ दी और प्रण लिया – अब जीवन का हर पल मातृभूमि के लिए।
आजीवन तपस्या
उस दिन से उन्होंने तीन प्रतिज्ञाएं ले लीं –
1. जीवनभर बाल न कटवाना
2. गेरुआ वस्त्र धारण करना
3. दिन में केवल एक बार भोजन करना
यह साधु-सा जीवन उन्होंने केवल अपने उत्तराखंड और उसकी राजधानी के सपने के लिए जिया।
बाबा मोहन उत्तराखंडी अपना परिवार छोड़कर उत्तराखंड आंदोलन में कूद गए उन्होंने सन् 1997 से 13 आमरण अनशन किया और आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी।
लेकिन 2004 में गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए बेनीताल में 38 दिनों तक भूख हड़ताल…
शरीर टूट रहा था, मगर इरादा नहीं।
8 अगस्त को प्रशासन ने उन्हें जबरन अस्पताल पहुंचाया।
9 अगस्त 2004 की सुबह, उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया – पर पीछे छोड़ गए बलिदान की अमर गाथा।
सिर्फ भूख हड़ताल नहीं, प्राणों की आहुति
उनका बलिदान सिर्फ एक राजनीतिक मांग नहीं था।
यह उस मिट्टी, उन पहाड़ों और उन लोगों के लिए प्राण त्यागना था, जिन्हें वे अपना परिवार मानते थे।
उनका सपना था – एक ऐसा उत्तराखंड, जिसकी राजधानी उसके पहाड़ों के दिल में हो – गैरसैण।
आज भी उनकी याद जिंदा है
हर साल 9 अगस्त को बेनीताल में शहीद स्मृति मेला लगता है। लोग वहां सिर्फ श्रद्धांजलि देने नहीं आते, बल्कि बाबा मोहन के अडिग संकल्प से प्रेरणा लेने आते हैं।
नई पीढ़ी के लिए संदेश
बाबा मोहन उत्तराखंडी की जिंदगी हमें सिखाती है –
देश और मातृभूमि के लिए सच्चा प्रेम त्याग से साबित होता है, शब्दों से नहीं।
उन्होंने हमें दिखाया कि जब इरादा अटल हो, तो साधन चाहे जितने कम हों, असर अमर हो जाता है।
आज भी पहाड़ की हवाओं में उनका नाम गूंजता है –
“मातृभूमि के लिए जीना और मरना ही सच्ची साधना है।”
