भारत छोड़ो आंदोलन – आज़ादी की निर्णायक पुकार -: वर्षगांठ विशेष
भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह उग्र और निर्णायक चरण था, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव को हिला दिया। यह आंदोलन 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में आरंभ हुआ और इसे भारत के इतिहास में “अगस्त क्रांति” के नाम से भी जाना जाता है।
1940 के दशक की शुरुआत में भारत में स्वतंत्रता की मांग तेज़ हो रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन ने भारत को युद्ध में झोंक दिया था, लेकिन भारतीय नेताओं और जनता से कोई राय नहीं ली गई।

कारण:
अंग्रेजों द्वारा भारत को बिना अनुमति युद्ध में शामिल करना।
क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता, जिसने भारत को तत्काल स्वतंत्रता देने से इंकार किया।
जनता में बढ़ता असंतोष और आज़ादी की तीव्र इच्छा।
गांधी जी का मानना था कि अब अंग्रेजों को “भारत छोड़ना ही होगा”, क्योंकि उनके रहते भारत का कल्याण संभव नहीं है।
भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान (ग्वालिया टैंक मैदान) से की।
9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में “भारत छोड़ो” का नारा दिया –
“करो या मरो” (Do or Die)।
स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक मोड़ दिया:
गांधी जी, नेहरू, पटेल सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए, फिर भी आंदोलन गाँव-गाँव, शहर-शहर फैल गया।
रेलवे स्टेशन, टेलीफोन लाइन, सरकारी कार्यालयों पर जनता का कब्ज़ा और हड़तालें हुईं।
युवा, किसान, छात्र और महिलाएं आंदोलन में कूद पड़े।
अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआक्रोश इतना बढ़ा कि ब्रिटेन को एहसास हो गया कि भारत पर लंबे समय तक शासन करना अब असंभव है।
निष्कर्ष
भारत छोड़ो आंदोलन ने साबित कर दिया कि आज़ादी अब केवल मांग नहीं, बल्कि जनता का अटल संकल्प है। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की अंतिम नींव रखी और मात्र पाँच साल बाद, 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हो गया।
