हरिद्वार में अष्टादश संस्कृत महोत्सव का शुभारंभ, स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—संस्कृत की प्रतिष्ठा, भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा
हरिद्वार। उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान, उत्तराखण्ड सरकार की ओर से संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, संवर्धन और विद्यार्थियों की प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 23 और 24 अक्टूबर को महाजन भवन, भूपतवाला, हरिद्वार में अष्टादश संस्कृत महोत्सव एवं राज्यस्तरीय संस्कृत प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव का उद्घाटन परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में हुआ।

राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश के सभी 13 जनपदों में आयोजित जनपदस्तरीय प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएं प्रतिभाग कर रहे हैं। महोत्सव के अंतर्गत संस्कृत नाटक, संस्कृत समूह नृत्य, समूहगान, वाद-विवाद, आशुभाषण और श्लोकोच्चारण सहित विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। इनमें विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के कनिष्ठ एवं वरिष्ठ वर्ग के विद्यार्थी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं।
उद्घाटन समारोह में स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, ऋषियों की चेतना और सनातन संस्कृति की शाश्वत वाणी है। संस्कृत की प्रतिष्ठा भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा है। संस्कृत से संस्कृति, संस्कृति से संस्कार और संस्कारों से सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आवश्यक है, लेकिन इससे पहले ऋषि बुद्धिमत्ता यानी ऋषियों के ज्ञान और विवेक को समझना जरूरी है। ऐसी बुद्धि, जो ज्ञान के साथ विवेक, विकास के साथ मूल्य और प्रगति के साथ करुणा प्रदान करे। भारतीय ऋषियों ने अपनी वाणी, वेदों और ज्ञान परंपरा के माध्यम से भारत की चेतना को युगों तक जीवंत रखा है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को ‘मेरे लिए क्या’ से आगे बढ़कर ‘मेरे द्वारा क्या’ और ‘मेरा प्रदेश कैसे बेहतर बने’ की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। उन्होंने ऐसे भविष्य के निर्माण का आह्वान किया, जिसमें विज्ञान और सनातन परंपरा, विकास और आध्यात्मिकता के साथ आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि संस्कृत सुरक्षित रहेगी तो संस्कृति सशक्त होगी और संस्कृति सशक्त होगी तो भारत का गौरव तथा मां भारती की चेतना चिरंजीवी रहेगी।
कार्यक्रम में संस्कृत के विद्वानों, आचार्यों, शिक्षाविदों, संस्कृत प्रेमियों और विद्यार्थियों ने भी सहभागिता की। इस अवसर पर वक्ताओं ने संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर विचार रखे।
यह महोत्सव युवाओं को भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा से जोड़ने तथा संस्कृत को शिक्षा, संवाद और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की सशक्त भाषा के रूप में प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

