ऋषिकेश

स्वामी चिदानन्द का संदेश: तीर्थाटन के साथ तीर्थसेवन भी जरूरी

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने श्रद्धालुओं को तीर्थाटन एवं तीर्थसेवन का संदेश देते हुए कहा कि तीर्थ यात्रा केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति से जुड़ने का माध्यम भी है। तीर्थों की स्वच्छता, पवित्रता, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि तीर्थ यात्रा भारतीय संस्कृति की ऐसी अनुपम परंपरा है, जो मनुष्य को अपनी जड़ों, संस्कारों, प्रकृति और अंतर्मन से जोड़ती है। तीर्थ जाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक वहां के आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में अपनाना और तीर्थों की सेवा करना भी है।

उन्होंने कहा कि तीर्थ का अर्थ केवल किसी प्रसिद्ध मंदिर, नदी, पर्वत या धार्मिक स्थल तक पहुंचना नहीं है। तीर्थ मनुष्य को अशांति से शांति, अज्ञान से ज्ञान और स्वार्थ से सेवा की ओर ले जाने का माध्यम है। जिन स्थानों पर ऋषियों ने तपस्या और साधना की तथा मानवता को जीवन जीने की दिशा दिखाई, वे कालांतर में श्रद्धा, साधना और आत्मचिंतन के केंद्र बने। इन स्थलों की महत्ता उनकी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक पहचान के साथ-साथ आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक परंपराओं और लोककल्याण की भावना में भी निहित है।

स्वामी जी ने कहा कि तीर्थ का भाव जीवन की सीमाओं, विकारों और भ्रमों से ऊपर उठकर विवेक, करुणा, संयम और आत्मबोध की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। तीर्थ यात्रा का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब वहां से लौटने के बाद व्यक्ति के विचारों में पवित्रता, व्यवहार में विनम्रता और कर्मों में सेवा का भाव दिखाई दे।

उन्होंने तीर्थाटन और तीर्थसेवन के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि तीर्थाटन व्यक्ति को तीर्थ तक ले जाता है, जबकि तीर्थसेवन उसे तीर्थ के आदर्शों से जोड़ता है। तीर्थाटन के दौरान श्रद्धालु पवित्र स्थलों के दर्शन करते हैं, वहीं तीर्थसेवन के माध्यम से उन स्थलों की स्वच्छता, गरिमा, पवित्रता और प्राकृतिक संपदा की रक्षा का संकल्प लेते हैं। तीर्थों ने सदियों से पीढ़ियों को जोड़ने, विविधताओं को एक सूत्र में पिरोने और भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे तीर्थ यात्रा के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें, नदियों में कचरा न डालें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें और स्थानीय संस्कृति एवं परंपराओं का सम्मान करें। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।

उन्होंने कहा कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी, डिजिटल व्यस्तताओं और प्रतिस्पर्धा के बीच तीर्थ मनुष्य को ठहरकर स्वयं से संवाद करने का अवसर देते हैं। श्रद्धालु तीर्थों में श्रद्धा के साथ आएं और सेवा का संकल्प लेकर लौटें। तीर्थ परंपराओं की रक्षा करना हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के समान है। तीर्थ यात्रा तभी पूर्ण होती है, जब वहां से प्राप्त आध्यात्मिक प्रकाश व्यक्ति के भीतर जागृत हो और उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए।

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