भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस: प्रकृति के साथ संतुलित विकास का संकल्प
ऋषिकेश। भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन और सतत विकास की भारतीय परंपरा का स्मरण कराता है। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि पृथ्वी से संसाधन लेने के साथ उसे लौटाने और संरक्षित करने का संकल्प भी निभाना होगा। उन्होंने पेड़ लगाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। सूर्य, वायु, जल, पृथ्वी और वनस्पतियों के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ऊर्जा संकट और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ना केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। घरों, उद्योगों, परिवहन, कृषि और डिजिटल तकनीक तक हर क्षेत्र ऊर्जा पर निर्भर है। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर लंबे समय तक निर्भरता ने आर्थिक विकास को गति दी, लेकिन इसके साथ वायु प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां भी बढ़ीं।
उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत और जैव ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोत भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। इनके विवेकपूर्ण उपयोग से जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि भारतीय सनातन जीवन-दृष्टि में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व कोई नया विचार नहीं है। हमारे ऋषियों ने सूर्य को ऊर्जा और जीवन का आधार माना तथा सूर्य, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के प्रति सम्मान की भावना विकसित की। उन्होंने कहा कि ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ की भावना मनुष्य और पृथ्वी के संबंध को स्पष्ट करती है। पृथ्वी हमारी माता है और हम उसकी संतान हैं, इसलिए प्रकृति का संरक्षण जीवन का स्वाभाविक अनुशासन होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता प्राचीन पर्यावरणीय चेतना को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़ने की है। भारत में बढ़ते शहरों, उद्योगों, परिवहन और डिजिटल अर्थव्यवस्था के साथ ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अक्षय ऊर्जा पर्यावरण संरक्षण के साथ ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का माध्यम बन सकती है।
उन्होंने सौर ऊर्जा को भारत के लिए विशेष रूप से उपयोगी बताते हुए कहा कि घरों, विद्यालयों, संस्थानों, आश्रमों और उद्योगों में रूफटॉप सोलर जैसी पहल को बढ़ावा दिया जा सकता है। अक्षय ऊर्जा के विस्तार से सोलर पैनल निर्माण, स्थापना, रखरखाव, ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और हरित तकनीक के क्षेत्र में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार सौर ऊर्जा को अपनाने, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करने और बिजली की बर्बादी रोकने में योगदान दे सकता है। सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और पैदल चलने को प्राथमिकता देना तथा इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ना भी स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
उन्होंने कहा, “सूर्य से ऊर्जा लें, लेकिन सूर्य के प्रति कृतज्ञता भी रखें। जल का उपयोग करें, लेकिन जल का संरक्षण भी करें। पृथ्वी से संसाधन लें, लेकिन पृथ्वी को लौटाने का संकल्प भी निभाएं। पेड़ लगाएं, भविष्य बचाएं।”
