तुलसीदास जयंती पर परमार्थ निकेतन में रामभक्ति और मानस वाचन
स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—रामचरितमानस मर्यादा, करुणा और सेवा का जीवन-दर्शन
ऋषिकेश। गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती के अवसर पर परमार्थ निकेतन में श्रीराम भक्ति, रामचरितमानस वाचन एवं आध्यात्मिक चिंतन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान आश्रम परिसर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रहा।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने तुलसीदास जयंती की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी अमृतमयी वाणी के माध्यम से भगवान श्रीराम को राजमहलों से निकालकर जन-जन के हृदय तक पहुंचाया। उन्होंने संस्कृत के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को लोकभाषा में प्रस्तुत कर भक्ति को प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहज बनाया।
उन्होंने कहा कि रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को राममय बनाने का मार्ग है। इसमें मर्यादा, करुणा, सेवा और समरसता के साथ मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाने का दर्शन समाहित है। यदि मानस को केवल पढ़ने के बजाय उसके संदेश को जीवन में उतारा जाए तो परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति एवं सद्भाव का विस्तार हो सकता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि वर्तमान समय में बाहरी प्रगति के साथ आंतरिक शांति की आवश्यकता भी बढ़ी है। तुलसीदास जी की वाणी हमें बताती है कि वास्तविक विकास केवल तकनीक से नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और चरित्र से होता है। श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, कर्तव्य और लोकमंगल का आदर्श है।
उन्होंने कहा कि रामचरितमानस की प्रत्येक चौपाई आत्मजागरण की प्रेरणा देती है। मानस का संदेश है कि भक्ति जीवन से पलायन नहीं, बल्कि प्रत्येक दायित्व को ईश्वरार्पण भाव से निभाने की साधना है। परिवार में प्रेम, समाज में सम्मान, प्रकृति के प्रति करुणा और राष्ट्र के प्रति समर्पण जैसे मूल्य इसके मूल संदेश में समाहित हैं।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी का साहित्य भारतीय संस्कृति की आत्मा है। रामचरितमानस ने सदियों से लोगों को विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, आशा और विश्वास प्रदान किया है। यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ ही संपूर्ण मानवता के लिए नैतिक एवं आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत है।
कार्यक्रम में श्रीराम भक्ति, मानस वाचन और आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से तुलसीदास जी के जीवन एवं साहित्य के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया।
