हरियाली अमावस्या पर प्रकृति संरक्षण का संदेश, युवाओं से पर्यावरण सेवा का आह्वान
ऋषिकेश। हरियाली अमावस्या के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में प्रकृति संरक्षण, वृक्षारोपण और पर्यावरणीय जागरूकता का संदेश दिया गया। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि हरियाली अमावस्या भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति, पर्यावरण और आध्यात्मिक चेतना के समन्वय का पर्व है। यह पर्व धरती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का अवसर है।

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि युवा केवल उम्र का नाम नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस, संकल्प और परिवर्तन की चेतना हैं। युवाओं में सपने, हृदय में करुणा, कर्म में सेवा और जीवन में संस्कार हों तो वे राष्ट्र और विश्व की दिशा बदल सकते हैं। उन्होंने युवाओं की ऊर्जा को सेवा, राष्ट्रनिर्माण, पर्यावरण संरक्षण और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। वृक्ष जीवनदाता हैं, नदियां जीवनदायिनी शक्ति हैं और पर्वत हमारी आध्यात्मिक चेतना के प्रहरी हैं। ‘प्रकृति में परमात्मा के दर्शन’ का भाव सनातन संस्कृति की मूल चेतना है। वृक्ष लगाना, जल बचाना, नदियों को स्वच्छ रखना और प्रदूषण कम करना वास्तव में ईश्वर की सृष्टि की सेवा है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट, घटते वन क्षेत्र और जैव विविधता का संरक्षण आज वैश्विक चुनौतियां हैं। ऐसे में हरियाली अमावस्या जैसे पर्वों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि पौधा लगाना सुंदर भविष्य की नींव रखने जैसा है। पौधे आने वाली पीढ़ियों को छाया और प्राणवायु देने के साथ पक्षियों व जीव-जंतुओं को आश्रय तथा मिट्टी को संरक्षण प्रदान करते हैं।
उन्होंने लोगों से पीपल, वट, नीम, तुलसी, बेल और आंवला सहित स्थानीय एवं उपयोगी पौधों का रोपण करने तथा पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत धर्म और सामाजिक कर्तव्य के रूप में अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सिंगल यूज प्लास्टिक का कम उपयोग, कचरे का उचित प्रबंधन, जल संरक्षण तथा नदियों और तालाबों की स्वच्छता में प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने आह्वान किया कि हरियाली अमावस्या पर प्रत्येक व्यक्ति ‘एक पौधा धरती मां के नाम’ लगाए और उसे केवल रोपित करने तक सीमित न रखकर परिवार के सदस्य की तरह उसका संरक्षण करे। उन्होंने कहा कि पौधा लगाना पहला कदम है, उसे जीवित रखना और वृक्ष बनने तक उसकी देखभाल करना वास्तविक पर्यावरण सेवा है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि धरती हरी होगी तो जीवन खुशहाल होगा, नदियां स्वच्छ होंगी तो सभ्यता सुरक्षित रहेगी और जंगल सुरक्षित होंगे तो भविष्य सुरक्षित रहेगा। उन्होंने सभी से प्रकृति को नमन करने, धरती मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को हरा-भरा बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
