देहरादून

पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद और भू-कानून के कथित दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग

अधिवक्ता सेवा मंच और पहाड़ स्वाभिमान सेना ने एराड़ी में 144 नाली भूमि खरीद समेत लैंसडौन-यमकेश्वर के मामलों पर उठाए सवाल

देहरादून। अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की खरीद-फरोख्त, भू-कानून के प्रावधानों के कथित दुरुपयोग और कृषि भूमि के भूखंडों में परिवर्तन कर बिक्री किए जाने के मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। मंगलवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि यदि ऐसे मामलों की प्रभावी जांच नहीं हुई तो प्रदेश की जल, जंगल और जमीन पर बाहरी भू-माफिया एवं व्यावसायिक संस्थाओं का प्रभाव बढ़ सकता है।

पत्रकार वार्ता में पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा करीब 144 नाली भूमि खरीदे जाने का मामला उठाया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि भूमि खरीद के समय दस्तावेजों में इसका प्रयोजन कृषि कार्य दर्शाया गया, जबकि रजिस्ट्री के बाद भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर बाहरी लोगों को बेचने की प्रक्रिया की जा रही है। उन्होंने भूमि खरीद से लेकर वर्तमान स्थिति तक राजस्व अभिलेखों, रजिस्ट्री दस्तावेजों, भूमि उपयोग, अनुमतियों और भूखंडों की बिक्री की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की।

कंपनी के गठन और पुरानी संपत्तियों की जांच की मांग

वक्ताओं ने संबंधित कंपनी द्वारा वर्ष 2003 से पूर्व की भूमि खरीद का आधार प्रस्तुत किए जाने और देहरादून में वर्ष 1997 में संपत्ति खरीदने के दावे पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि संबंधित तिथि और पंजीकरण संख्या के आधार पर उपलब्ध अभिलेखों की स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कंपनी के गठन, निदेशकों, पूर्व निदेशकों, शेयरहोल्डिंग, संपत्तियों और उत्तराखंड में वास्तविक गतिविधियों की विस्तृत जांच की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि केवल कंपनी के पुराने पंजीकरण के आधार पर भूमि खरीद की पात्रता तय नहीं की जानी चाहिए, बल्कि भूमि खरीद के समय घोषित उद्देश्य और वर्तमान उपयोग का भी मिलान होना चाहिए।

लैंसडौन और यमकेश्वर में विशेष जांच की मांग

पत्रकार वार्ता में लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्र में भूमि खरीद-फरोख्त, प्लॉटिंग और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े मामलों की भी जांच की मांग उठाई गई। वक्ताओं ने राजस्व, वन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम गठित कर विशेष अभियान चलाने की मांग की।

कैटल गांव में कथित पेड़ कटान के बाद आश्रम निर्माण और निर्माण स्थल तक पहुंचने वाले मार्ग को लेकर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि यदि मार्ग आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजरता है तो उसकी वैधता, वन विभाग की अनुमति और संबंधित भूमि अभिलेखों की जांच होनी चाहिए। आश्रम के लिए खरीदी गई भूमि में मौजूद बहुमूल्य पेड़ों का दस्तावेजों में उल्लेख नहीं होने के आरोपों की भी जांच की मांग की गई।

भूजल दोहन और व्यावसायिक गतिविधियों पर चिंता

वक्ताओं ने पर्वतीय क्षेत्रों में आश्रमों, होटल, रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों द्वारा कथित रूप से कराई जा रही बोरिंग पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोत अत्यंत संवेदनशील हैं और अनियंत्रित भूजल दोहन का असर स्थानीय ग्रामीणों पर पड़ सकता है। ऐसे प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग, जल स्रोतों और संबंधित अनुमतियों का वैज्ञानिक एवं विभागीय ऑडिट कराने की मांग की गई।

यमकेश्वर क्षेत्र में कृषि भूमि पर आश्रम, वेलनेस सेंटर, पंचकर्म केंद्र और रिसॉर्ट जैसी व्यावसायिक गतिविधियां संचालित किए जाने के मामलों की भी जांच की मांग की गई। वक्ताओं ने भूमि उपयोग, नक्शा स्वीकृति, निर्माण अनुमति, पर्यटन विभाग की अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृति और जल उपयोग सहित सभी वैधानिक अनुमतियों की जांच की मांग रखी।

राजस्व विभाग की भूमिका की भी जांच की मांग

अधिवक्ता सेवा मंच ने कहा कि यदि भूमि खरीद अथवा उपयोग में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो केवल भूमि खरीदार की ही नहीं, बल्कि संबंधित अभिलेखों को स्वीकृत करने वाली प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। वक्ताओं ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के मद्देनजर जिम्मेदारी तय करने वाली निष्पक्ष जांच व्यवस्था बनाने की मांग की।

भू-कानून की समीक्षा की मांग

वक्ताओं ने वर्ष 2017-18 में भू-कानून में किए गए संशोधनों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की मांग की। उनका कहना था कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भूमि खरीद और व्यावसायिक उपयोग के लिए स्पष्ट एवं प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।

उन्होंने वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई कंपनियों द्वारा उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार विशेष ऑडिट कराने, भूमि खरीद के घोषित प्रयोजन और वर्तमान उपयोग का मिलान कराने तथा बाहरी कंपनियों द्वारा खरीदी गई भूमि के वास्तविक उपयोग की निगरानी के लिए विशेष मॉनिटरिंग व्यवस्था बनाने की मांग की।

वक्ताओं ने सरकार से एराड़ी में 144 नाली भूमि की खरीद, लैंसडौन और यमकेश्वर में भूमि कारोबार, प्लॉटिंग, रिसॉर्ट, आश्रम और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की जांच कराने तथा आरक्षित वन क्षेत्रों में बनाए गए मार्गों और निर्माण कार्यों की भी जांच कराने की मांग की।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जमीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। इसलिए भूमि कानूनों का उद्देश्य स्थानीय लोगों के हितों के साथ पर्यावरण, जलस्रोतों और पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना की सुरक्षा भी होना चाहिए। उन्होंने सरकार से आरोपों की दस्तावेजों के आधार पर जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक करने और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति, कंपनी अथवा अधिकारी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की।

पत्रकार वार्ता में अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप चमोली, पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल, एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट और एडवोकेट प्रदीप पासवान मौजूद रहे।

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