बाबा मोहन उत्तराखंडी : पहाड़ के स्वाभिमान और गैरसैंण के सपने के लिए जीवन न्योछावर करने वाले जननायक
बलिदान दिवस विशेष
उत्तराखंड के इतिहास में कई ऐसे आंदोलनकारी हुए, जिन्होंने अलग राज्य के सपने को साकार करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हैं, जिनका संघर्ष राज्य बनने के बाद भी थमा नहीं। बाबा मोहन उत्तराखंडी उन्हीं विरले जननायकों में से एक थे, जिन्होंने उत्तराखंड को केवल अलग राज्य के रूप में नहीं, बल्कि पहाड़ की जनता के सपनों और आकांक्षाओं के अनुरूप विकसित राज्य के रूप में देखने का सपना संजोया था।

9 अगस्त 2004 को गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर 38 दिनों के आमरण अनशन के बाद बाबा मोहन उत्तराखंडी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। आज भी उनका नाम उत्तराखंड की जनचेतना, गैरसैंण आंदोलन और पहाड़ के स्वाभिमान के साथ लिया जाता है।
पौड़ी की धरती पर हुआ जन्म
बाबा मोहन उत्तराखंडी का वास्तविक नाम मोहन सिंह नेगी था। उनका जन्म 3 दिसंबर 1948 को पौड़ी गढ़वाल जिले के एकेश्वर ब्लॉक के बठोली गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम मनवर सिंह नेगी और माता का नाम कमला देवी बताया जाता है। वे तीन भाइयों में मंझले थे।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद हाईस्कूल/इंटरमीडिएट और आईटीआई की शिक्षा हासिल की। इसके बाद वर्ष 1970 में भारतीय सेना के बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप (BEG) में क्लर्क के रूप में भर्ती हुए। लेकिन पहाड़ और समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी उन्हें लंबे समय तक सेना की नौकरी में नहीं रोक सकी। उन्होंने नौकरी छोड़कर सामाजिक सरोकारों और उत्तराखंड आंदोलन का रास्ता चुना।
1994 के बाद बदल गया जीवन
वर्ष 1994 का उत्तराखंड आंदोलन बाबा मोहन उत्तराखंडी के जीवन में निर्णायक मोड़ लेकर आया। रामपुर तिराहा कांड ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने एक कठोर संकल्प लिया कि जब तक इस घटना के दोषियों को न्याय नहीं मिलता, वे अपने बाल और दाढ़ी नहीं कटवाएंगे।
इसी संकल्प और तपस्वी जीवनशैली के कारण वे धीरे-धीरे ‘बाबा मोहन उत्तराखंडी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उनका पहनावा, बढ़ी हुई जटाएं और संघर्षपूर्ण जीवन उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनकी अलग पहचान बन गया।
राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका
बाबा मोहन उत्तराखंडी ने अलग उत्तराखंड राज्य के लिए लगातार संघर्ष किया। उनका पहला प्रमुख आमरण अनशन 11 जनवरी 1997 को लैंसडौन के देवीधार में बताया जाता है। इसके बाद उन्होंने सतपुली, गुमखाल, गैरसैंण, पौड़ी और थराली सहित विभिन्न स्थानों पर आंदोलन और आमरण अनशन किए।
कहा जाता है कि उन्होंने उत्तराखंड राज्य और गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर 13 बार आमरण अनशन किया। उनका संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं था, बल्कि वे पहाड़ के गांवों तक विकास, रोजगार और सम्मान पहुंचाने वाले उत्तराखंड की कल्पना करते थे।
राज्य बना, लेकिन सपना अधूरा रह गया
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य आंदोलनकारियों के लंबे संघर्ष का एक सपना पूरा हुआ, लेकिन बाबा मोहन उत्तराखंडी संतुष्ट नहीं हुए।
उनके लिए सवाल केवल अलग राज्य का नहीं था। उनका मानना था कि यदि पहाड़ के नाम पर राज्य बना है तो उसकी स्थायी राजधानी भी पहाड़ के बीचोंबीच गैरसैंण में होनी चाहिए।
उन्होंने गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को अपने जीवन का अंतिम मिशन बना लिया।
38 दिन का अंतिम आमरण अनशन
बाबा मोहन उत्तराखंडी ने 2 जुलाई 2004 को गैरसैंण के निकट बेनीताल क्षेत्र के टोपरी उडियार में आमरण अनशन शुरू किया। उनका शरीर लगातार कमजोर होता गया, लेकिन गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का संकल्प कमजोर नहीं हुआ।
38 दिनों तक चले इस अनशन के दौरान उनका स्वास्थ्य बेहद खराब हो गया। 8 अगस्त 2004 को प्रशासन उन्हें वहां से उठाकर कर्णप्रयाग के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गया। अगले दिन 9 अगस्त 2004 को उनका निधन हो गया।
उनकी शहादत ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया। उनका बलिदान इस सवाल को हमेशा के लिए प्रदेश की राजनीति और जनचर्चा के केंद्र में छोड़ गया कि जिस पहाड़ के लिए राज्य बनाया गया, क्या उस पहाड़ की मूल आकांक्षाओं को वास्तव में पूरा किया गया?
परिवार से बड़ा हो गया था उत्तराखंड
बाबा मोहन उत्तराखंडी का संघर्ष केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं था। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं, नौकरी और पारिवारिक जीवन तक को पीछे छोड़ दिया।
उनका जीवन बताता है कि आंदोलन उनके लिए कोई राजनीतिक अवसर नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प था। यही कारण है कि उन्हें उत्तराखंड आंदोलन के सबसे तपस्वी और संघर्षशील चेहरों में याद किया जाता है।
आज भी प्रासंगिक है बाबा का सपना
बाबा मोहन उत्तराखंडी को याद करना केवल उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके सपनों को समझना और उत्तराखंड की वर्तमान परिस्थितियों को उनके विचारों की कसौटी पर परखना भी जरूरी है।
आज पहाड़ पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा, सड़क और गांवों में घटती आबादी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में बाबा मोहन उत्तराखंडी का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि उत्तराखंड राज्य का उद्देश्य केवल भौगोलिक सीमाओं का निर्माण नहीं, बल्कि पहाड़ के आम आदमी के जीवन में बदलाव लाना था।
गैरसैंण का सवाल भी आज उनके बलिदान की याद दिलाता है। उनके लिए गैरसैंण केवल राजधानी का मुद्दा नहीं, बल्कि पहाड़ की राजनीतिक भागीदारी और स्वाभिमान का प्रतीक था।
बलिदान को स्मृति नहीं, संकल्प बनाना होगा
बाबा मोहन उत्तराखंडी का जीवन हमें सिखाता है कि किसी विचार के प्रति सच्ची निष्ठा क्या होती है। उन्होंने जिस उत्तराखंड का सपना देखा, उसके लिए संघर्ष किया और अंततः अपने प्राणों की आहुति दे दी।
आज उनके बलिदान दिवस पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके संघर्ष को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उनके सपनों के उत्तराखंड पर गंभीरता से विचार करें।
बाबा मोहन उत्तराखंडी की ज्वाला बुझी नहीं है।
वह आज भी पहाड़ के गांवों, युवाओं और उत्तराखंड की अस्मिता के सवालों में जीवित है।
जिसने उत्तराखंड के लिए नौकरी छोड़ी,
जिसने परिवार से बढ़कर पहाड़ को चुना,
जिसने बार-बार अनशन किया,
और अंततः गैरसैंण के सपने के लिए प्राण न्योछावर कर दिए
ऐसे जननायक बाबा मोहन उत्तराखंडी को शत्-शत् नमन।
