गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि पर परमार्थ निकेतन में भावपूर्ण श्रद्धांजलि
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा—गुरुदेव की लेखनी में भारत की संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, प्रकृति प्रेम और विश्व बंधुत्व की दिव्य अभिव्यक्ति
ऋषिकेश। विश्वविख्यात साहित्यकार, दार्शनिक और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि पर परमार्थ निकेतन में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष एवं परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने गुरुदेव के साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक योगदान को स्मरण करते हुए उनके विचारों को वर्तमान समय में भी प्रासंगिक बताया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर महान कवि, साहित्यकार और दार्शनिक होने के साथ भारत की आत्मा के स्वर थे। उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, प्रकृति प्रेम, मानवता और विश्व बंधुत्व की अद्भुत अभिव्यक्ति दिखाई देती है। साहित्य साधना के माध्यम से उन्होंने भारत को विश्व पटल पर विशिष्ट पहचान दिलाई।

उन्होंने कहा कि गुरुदेव की रचनाओं में शब्दों के साथ संवेदनाओं की गंगा प्रवाहित होती है, जो मनुष्य को भीतर से जागृत कर प्रेम, करुणा और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने साहित्य को समाज के जागरण, आत्मबोध और राष्ट्र चेतना का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी अमर कृति ‘गीतांजलि’ सहित अन्य रचनाएं भारतीय साहित्य की गौरवशाली विरासत हैं।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में भी गुरुदेव का योगदान अद्वितीय रहा। शांतिनिकेतन की स्थापना के माध्यम से उन्होंने ऐसी शिक्षा व्यवस्था की परिकल्पना की, जिसमें प्रकृति, संस्कृति, कला और आध्यात्मिकता का सुंदर समन्वय हो। उनका मानना था कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाली साधना होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज जब विश्व अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे समय में गुरुदेव का मानवतावादी दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनका चिंतन यह संदेश देता है कि विकास के साथ संवेदना, प्रगति के साथ प्रकृति संरक्षण और ज्ञान के साथ विनम्रता भी आवश्यक है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गुरुदेव का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा, विचार और कर्म के माध्यम से एक व्यक्ति पूरे विश्व को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया और भारतीय संस्कृति में निहित सर्वमानव कल्याण के भाव को दुनिया के सामने रखा।
उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे गुरुदेव के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करें, साहित्य और संस्कृति का सम्मान करें तथा प्रेम, करुणा, सेवा और समरसता के मूल्यों को आगे बढ़ाते हुए श्रेष्ठ समाज के निर्माण में योगदान दें।
इस अवसर पर परमार्थ निकेतन की गंगा आरती गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की साहित्य साधना और उनके मानवतावादी विचारों को समर्पित की गई। श्रद्धांजलि देते हुए उनके अमर विचारों और रचनाओं को स्मरण किया गया तथा कामना की गई कि उनकी साहित्यिक चेतना और जीवन दर्शन सदैव मानवता का मार्ग आलोकित करते रहें।
