पौड़ी

1974 से जनसंघर्ष की राह पर डॉ. शक्तिशैल कपरवाण, आमरण अनशन से लेकर पदयात्राओं तक उठाई पहाड़ की आवाज

यमकेश्वर/पौड़ी। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के वरिष्ठ नेता एवं संरक्षक डॉ. शक्तिशैल कपरवाण पिछले पांच दशकों से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार संघर्षरत रहे हैं। वर्ष 1974 से जनसमस्याओं को लेकर मुखर रहे डॉ. कपरवाण ने सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और ग्रामीणों के अधिकारों को लेकर अनेक आंदोलन किए हैं।

वर्ष 1990 में उन्होंने यमकेश्वर क्षेत्र की समस्याओं को लेकर विंदवासिनी मंदिर घाटी में 5 मार्च से 12 मार्च तक आमरण अनशन किया। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य कोड़िया–किमसार मोटर मार्ग का निर्माण तथा किमवाणी और तल्ला बनास क्षेत्र के ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। उस समय क्षेत्र में भू-स्खलन और सड़क संपर्क बाधित होने से लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था।

समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, डॉ. कपरवाण ने प्रशासन से भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों के स्थायी समाधान, प्रभावित ग्रामीणों की सुरक्षा तथा मोटर मार्ग के शीघ्र निर्माण की मांग की थी। आंदोलन को स्थानीय ग्रामीणों, महिलाओं और उत्तराखंड क्रांति दल के कार्यकर्ताओं का व्यापक समर्थन मिला। विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की टीम ने भी क्षेत्र का निरीक्षण कर भू-स्खलन की स्थिति का अध्ययन किया था।

डॉ. कपरवाण ने अपने छात्र जीवन से ही पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को अपना लक्ष्य बनाया। जनहित के मुद्दों पर उन्होंने कई बार आमरण अनशन, क्रमिक अनशन, धरना, प्रदर्शन, पैदल यात्राएं और जनसंवाद आयोजित किए। वे हजारों किलोमीटर की पदयात्रा कर ग्रामीणों की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचाते रहे हैं।

बीन नदी पुल निर्माण और कोड़िया–किमसार मोटर मार्ग उनकी वर्षों पुरानी प्रमुख मांगों में शामिल रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने राजाजी नेशनल पार्क से प्रभावित ग्रामीणों के अधिकारों, हक-हकूक, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार तथा विस्थापन जैसे मुद्दों को भी लगातार उठाया है।

डॉ. कपरवाण का कहना रहा है कि पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रोजगार की मजबूत व्यवस्था के बिना विकास संभव नहीं है। वे खेती, बागवानी और पशुपालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हुए जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नीति की मांग करते रहे हैं। उनका मानना है कि किसानों की आजीविका मजबूत होने से पलायन पर रोक लगेगी और गांव आत्मनिर्भर बनेंगे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर आवाज उठाने वाले डॉ. शक्तिशैल कपरवाण आज भी जनमुद्दों पर सक्रिय हैं। वर्ष 1974 से शुरू हुआ उनका जनसंघर्ष आज भी लगातार जारी है और वे विभिन्न सामाजिक एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर अपनी बात मजबूती से रखते रहे हैं।

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