अंतर्राष्ट्रीय आशा दिवस पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का संदेश
“आशा के बिना शांति नहीं, विश्वास के बिना विकास नहीं और शांति व विकास के बिना भविष्य नहीं”
ऋषिकेश। अंतर्राष्ट्रीय आशा दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने मानवता को आशा, विश्वास, करुणा और सेवा का संदेश देते हुए कहा कि आज का विश्व युद्ध, हिंसा, मानसिक तनाव, सामाजिक असमानता, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में आशा केवल एक भावना नहीं, बल्कि मानव चेतना को दिशा देने वाली दिव्य शक्ति है।

उन्होंने कहा कि “आशा के बिना शांति नहीं, विश्वास के बिना विकास नहीं और शांति व विकास के बिना भविष्य नहीं।” आशा, विश्वास और परस्पर आस्था व्यक्ति के चरित्र, समाज की संस्कृति और विश्व के उज्ज्वल भविष्य के तीन प्रमुख स्तंभ हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का संदेश देकर मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी थी। आशा वह आंतरिक प्रकाश है, जो कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस प्रदान करता है। महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने सिद्ध किया है कि मानवता केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि आशा, सहयोग और करुणा से सुरक्षित रहती है।
उन्होंने कहा कि केवल आशा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे विश्वास और सेवा का आधार भी मिलना चाहिए। विश्वास परिवारों को जोड़ता है, समाज में सहयोग बढ़ाता है और राष्ट्रों के बीच शांति एवं साझेदारी का मार्ग प्रशस्त करता है। जहाँ विश्वास समाप्त होता है, वहाँ भय, हिंसा और विभाजन जन्म लेते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि सनातन संस्कृति का मूल संदेश “वसुधैव कुटुम्बकम्” आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यदि संपूर्ण पृथ्वी को एक परिवार माना जाए तो मानवता जाति, धर्म, भाषा और सीमाओं से ऊपर उठकर साझा भविष्य का निर्माण कर सकती है।
उन्होंने आधुनिक जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भौतिक सुविधाओं के विस्तार के साथ मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद भी बढ़ रहा है। योग, ध्यान, प्रार्थना, सत्संग, सेवा और प्रकृति के साथ जुड़ाव ही मन की शांति और सकारात्मक जीवन का वास्तविक मार्ग है।
पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि नदियाँ, वन, पर्वत, जल, वायु और जैव विविधता केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ गंगा अभियान, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए आशा का बीजारोपण हैं।
अंत में स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने युवाओं से अपने-अपने क्षेत्रों में “आशा के दूत” बनने का आह्वान करते हुए कहा कि आशा भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि भविष्य का निर्माण करती है। उन्होंने सभी से सेवा, करुणा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के साथ ऐसा विश्व बनाने का आह्वान किया, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, सुरक्षा, शांति और समरसता के साथ जीवन जी सके।
