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गढ़वाल के गौरवशाली इतिहास में ‘गढ़ों’ की धरती से लेकर वीरता की मिसाल तक

देवभूमि उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र अपने गढ़ों, वीरों और आज़ादी के संघर्ष के लिए जाना जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो गढ़वाल का नाम ही ‘गढ़ों’ यानी किलों से पड़ा। 14वीं सदी में राजा अजयपाल ने 52 गढ़ों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, तब से केदारखंड को गढ़वाल कहा जाने लगा। हालांकि इतिहासकारों के मुताबिक यहां 300 से अधिक छोटे-बड़े गढ़ रहे हैं।

 

गढ़वाल का आधुनिक इतिहास भी उतना ही गौरवशाली है। सन 1815 में गोरखों का शासन गढ़वाल क्षेत्र से समाप्त हुआ, जब अंग्रेजों ने 21 अप्रैल 1815 को गढ़वाल के आधे हिस्से पर अपना शासन स्थापित किया, जिसे बाद में ‘ब्रिटिश गढ़वाल’ कहा गया।

*आजादी की लड़ाई में गढ़वाल का योगदान:*

23 अप्रैल 1930 को पेशावर कांड में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था। उनके इस साहस के बाद मोतीलाल नेहरू ने 23 अप्रैल को ‘गढ़वाल दिवस’ मनाने की घोषणा की थी। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसंबर 1891 को पौड़ी के थलीसैंण में हुआ था।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी गढ़वाल पीछे नहीं रहा। 5 सितंबर 1942 को अल्मोड़ा के सल्ट में अंग्रेजों की गोलीबारी में चार लोग शहीद हुए, जिसे गांधी जी ने ‘कुमाऊँ का बारदोली’ कहा। वहीं गुज़ादू ( गुजड़ू) को ‘गढ़वाल का बारदोली’ कहा जाता है क्योंकि यहां 1930 के दशक में सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़ी भागीदारी रही।

1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में ऐतिहासिक विलय हुआ, जिसके बाद गढ़वाल मंडल का स्वरूप बदलता गया। 1969 में पौड़ी मुख्यालय के साथ गढ़वाल मंडल का गठन हुआ।

आज भी गढ़वाल अपने 52 गढ़ों की कहानी, पंवार वंश के शौर्य और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे सपूतों की वीरता के लिए याद किया जाता है।

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