वट पूर्णिमा पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का संदेश: परिवार ही संस्कार, प्रेम और विश्वास की पहली पाठशाला
ऋषिकेश। वट पूर्णिमा और संत कबीर दास की 628वीं जयंती के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने मातृशक्ति को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वट पूर्णिमा केवल अखंड सौभाग्य का पर्व नहीं, बल्कि परिवार, संस्कार, समर्पण, विश्वास और सनातन मूल्यों को सशक्त बनाने का पावन अवसर है।

संत कबीर दास को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए स्वामी जी ने कहा कि कबीर ने समाज को प्रेम, करुणा, समानता और आत्मज्ञान का संदेश दिया। उनके विचार आज भी सामाजिक सद्भाव और मानवता की प्रेरणा देते हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आधुनिकता के इस दौर में परिवारों में संवाद, आत्मीयता और संस्कारों को जीवित रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि “संस्कार किसी पुस्तक से नहीं, बल्कि परिवार के वातावरण से जन्म लेते हैं।” माता-पिता और बुजुर्गों का आचरण ही बच्चों की सबसे बड़ी पाठशाला होता है।
उन्होंने कहा कि वट वृक्ष भारतीय संस्कृति में स्थिरता, संरक्षण और दीर्घायु का प्रतीक है। परिवार भी ऐसा होना चाहिए जहां प्रत्येक सदस्य को प्रेम, सम्मान, सुरक्षा और अपनापन मिले। उन्होंने घरों में प्रतिदिन प्रार्थना, भजन, सत्संग, स्वाध्याय और पारिवारिक संवाद की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया।
स्वामी जी ने कहा कि वट पूर्णिमा हमें केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को परिवार मानने की प्रेरणा देती है। यदि प्रत्येक परिवार प्रेम, सेवा, सहयोग और नैतिक मूल्यों का केंद्र बनेगा, तो राष्ट्र मजबूत होगा और विश्व में शांति एवं सद्भाव का वातावरण स्थापित होगा।
उन्होंने सभी से वट पूर्णिमा के अवसर पर परिवारों में प्रेम, विश्वास, सेवा, करुणा और संस्कारों का वटवृक्ष रोपित करने तथा आने वाली पीढ़ियों को संवेदनशील, जिम्मेदार और चरित्रवान बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
