पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती को विवेकानन्द सेवा सम्मान 2026
भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और मानव सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए किया गया सम्मानित
कोलकाता, 30 मई। परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के परमाध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज को कोलकाता के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित भव्य समारोह में ‘‘40वाँ विवेकानन्द सेवा सम्मान 2026’’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उन्हें भारतीय संस्कृति एवं सनातन परंपरा के संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन, मानव कल्याण तथा मानवीय मूल्यों के प्रसार में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।
समारोह की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी राधेश्याम गोयनका ने की। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल सरकार के पंचायत, ग्रामीण विकास, कृषि एवं पशु संसाधन विकास मंत्री दिलीप घोष, प्रख्यात आयकर सलाहकार सज्जन कुमार तुलस्यान तथा विश्वविख्यात आध्यात्मिक वक्ता डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती की गरिमामयी उपस्थिति रही।
वक्ताओं ने कहा कि स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सेवा को साधना, करुणा को संस्कृति और मानवता को धर्म मानकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन का कार्य किया है। गंगा संरक्षण, पर्यावरण जागरूकता, महिला सशक्तिकरण, युवा चरित्र निर्माण, अंतरधार्मिक सद्भाव और वैश्विक शांति के लिए उनके प्रयासों ने देश-विदेश में नई प्रेरणा प्रदान की है।
समाजसेवी विनोद बागरोड़िया ने कहा कि स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सनातन संस्कृति को केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित न रखकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का कार्य किया है। विशेष रूप से ‘‘दिव्यांग मुक्त भारत अभियान’’ के माध्यम से हजारों दिव्यांगजनों के जीवन में आशा, सम्मान और आत्मनिर्भरता का संचार हुआ है।
डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि पूज्य स्वामीजी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि वास्तविक अध्यात्म समाज से दूर जाने में नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर करुणा और सेवा के साथ कार्य करने में निहित है। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने अनगिनत लोगों को यह अनुभव कराया है कि जब हृदय में करुणा जागती है तो सेवा स्वयं साधना बन जाती है।
समारोह में वक्ताओं ने स्वामी विवेकानन्द और स्वामी चिदानन्द सरस्वती के जीवन-दर्शन की समानताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि दोनों महापुरुषों ने अध्यात्म को समाज सेवा से जोड़ा। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित ‘‘दरिद्र नारायण सेवा’’ की भावना को स्वामी चिदानन्द सरस्वती आज वैश्विक स्तर पर साकार कर रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि ‘‘नर सेवा ही नारायण सेवा’’ और ‘‘मानवता ही सबसे बड़ा धर्म’’ का संदेश आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह सम्मान न केवल स्वामी चिदानन्द सरस्वती के कार्यों का सम्मान है, बल्कि सेवा, समर्पण, करुणा और मानवता की उस सनातन परंपरा का भी अभिनंदन है, जो समाज और विश्व को नई दिशा देने का कार्य करती है।
