ऋषिकेश

साध्वी भगवती सरस्वती का 26वां संन्यास दिवस श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया

ऋषिकेश। गंगा दशहरा के पावन अवसर पर सोमवार को परमार्थ निकेतन में डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती का 26वां संन्यास दिवस भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मां गंगा तट पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संत-महात्मा एवं भक्तजन उपस्थित रहे।

मानस कथा के मंच से अपने भावपूर्ण उद्बोधन में साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि “मैं भारत में नहीं रहती, बल्कि भारत मुझमें रहता है।” उन्होंने कहा कि अमेरिका में उच्च शिक्षा, प्रतिष्ठा और सभी सुविधाएं होने के बावजूद उनके भीतर एक गहरा खालीपन था। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त करने के बाद भी उन्हें वह आत्मिक शांति और आनंद नहीं मिला जिसकी उनकी आत्मा तलाश कर रही थी।

उन्होंने कहा कि हॉलीवुड की चकाचौंध से हिमालय की गोद तक की उनकी यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मजागरण की यात्रा रही है। लगभग दो दशक पूर्व जब वे पहली बार गंगा तट स्थित परमार्थ निकेतन पहुंचीं और पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती तथा मां गंगा का सान्निध्य प्राप्त हुआ, तभी उनके जीवन की दिशा और दृष्टि पूरी तरह बदल गई।

साध्वी जी ने कहा कि “मेरे पास डिग्रियां थीं, उपलब्धियां थीं, सब कुछ था, लेकिन भीतर कहीं रिक्तता थी। परमार्थ निकेतन और मां गंगा की गोद में आकर वह खालीपन भर गया। यहां मुझे केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य मिला। पूज्य स्वामी जी के सान्निध्य में मुझे आत्मिक समृद्धि प्राप्त हुई।”

उन्होंने भारतीय संस्कृति को जीवन जीने की दिव्य कला बताते हुए कहा कि यह सम्पूर्ण विश्व को प्रेम, करुणा, सेवा और एकत्व का संदेश देती है। भारत उनके लिए केवल एक देश नहीं, बल्कि उनका आध्यात्मिक घर है।

इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि साध्वी भगवती सरस्वती का जीवन पूर्व और पश्चिम के सुंदर समन्वय का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता, पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण और वैश्विक शांति के लिए समर्पित किया है।

कार्यक्रम में संन्यास दिवस महोत्सव को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, मां गंगा की महिमा और गुरु-शिष्य परंपरा का दिव्य उत्सव बताया

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