उत्तराखंड

“उत्तराखंड में क्षेत्रफल के आधार पर हो परिसीमन”

उत्तराखंड राज्य का गठन केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि उसकी विषम भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। हिमालयी राज्य होने के कारण यहां की भौगोलिक संरचना, वन क्षेत्र, दुर्गमता और बिखरी हुई आबादी इसे देश के अन्य राज्यों से अलग बनाती है। ऐसे में विधानसभा सीटों का परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर करना, राज्य के वास्तविक विकास की जरूरतों के साथ न्याय नहीं करता।

पर्वतीय वास्तविकता और वन क्षेत्र का दबाव

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगभग 85% से 88% तक भूभाग वन क्षेत्र में आता है। इसका सीधा प्रभाव यह है कि:

आबादी छोटे-छोटे गांवों में बंटी हुई है

एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचना कठिन है

सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सीमित हैं

इन परिस्थितियों में यदि विधानसभा सीटों का आकार (क्षेत्रफल) बहुत बड़ा होगा, तो जनप्रतिनिधियों के लिए हर क्षेत्र तक पहुंच पाना बेहद कठिन हो जाएगा।

पलायन: एक गंभीर संकट

रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार पलायन हो रहा है।

गांव खाली हो रहे हैं

खेती बंजर हो रही है

सामाजिक संरचना कमजोर पड़ रही है

यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो कम होती आबादी वाले इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व और भी कमजोर हो जाएगा, जिससे पलायन की समस्या और बढ़ सकती है।

⚖️ क्षेत्रफल आधारित परिसीमन की आवश्यकता

पर्वतीय राज्य में प्रशासनिक इकाइयों का आकार छोटा होना चाहिए।

ग्राम सभा, न्याय पंचायत, ब्लॉक, तहसील, जनपद और विधानसभा — सभी का दायरा सीमित हो

इससे प्रशासनिक पहुंच आसान होगी

योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर होगा

जनता और जनप्रतिनिधि के बीच सीधा संवाद संभव होगा

राज्य गठन का मूल उद्देश्य

यदि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य होतीं, तो शायद इसे उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

पृथक राज्य की मांग इसलिए उठी क्योंकि:

यहां की समस्याएं अलग थीं

समाधान के लिए अलग नीति की जरूरत थी

स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की आवश्यकता थी

निष्कर्ष

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विधानसभा सीटों का परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि क्षेत्रफल और भौगोलिक विषमता को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

यह न केवल लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करेगा, बल्कि राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों के विकास को भी सुनिश्चित करेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नीति निर्माण में “एक जैसा नियम” नहीं, बल्कि “स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान” अपनाया जाए—तभी उत्तराखंड का संतुलित और समग्र विकास संभव है।

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