रवाईं कांड: अन्याय के खिलाफ उठी पहाड़ की आवाज
उत्तराखंड के इतिहास में 27 मार्च 1930 का दिन एक महत्वपूर्ण और संघर्षपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है। इस दिन रवाईं घाटी के ग्रामीणों ने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया, जिसे आज “रवाईं कांड” के नाम से जाना जाता है।
उस समय टिहरी रियासत में जनता पर अत्यधिक करों का बोझ था। इसके साथ ही जबरन बेगार प्रथा भी लागू थी, जिसमें ग्रामीणों को बिना किसी पारिश्रमिक के काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था ने आम लोगों का जीवन अत्यंत कठिन बना दिया था। धीरे-धीरे यह असंतोष एक बड़े जनआंदोलन में बदल गया।

इस आंदोलन का नेतृत्व नागेन्द्र दत्त सकलानी, बलभद्र सिंह नेगी, मोहिनी देवी और देवकी नंदन बहुगुणा जैसे साहसी नेताओं ने किया। इन नेताओं ने ग्रामीणों को संगठित कर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया।
27 मार्च 1930 को जब ग्रामीणों ने कर व्यवस्था और बेगार प्रथा के विरोध में एकजुट होकर प्रदर्शन किया, तब टिहरी रियासत की सेना ने आंदोलनकारियों पर गोली चला दी। इस निर्मम कार्रवाई में कई निर्दोष ग्रामीण शहीद हो गए। यह घटना न केवल क्रूर दमन का उदाहरण बनी, बल्कि पहाड़ के लोगों के संघर्ष और बलिदान की अमिट गाथा भी बन गई।
इस घटना के बाद आंदोलन के कई नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, लेकिन इससे जनता का हौसला टूटा नहीं। बल्कि रवाईं कांड ने पूरे क्षेत्र में जनजागरण को और तेज कर दिया और टिहरी रियासत के खिलाफ विरोध की लहर को मजबूत किया।
रवाईं कांड केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह अन्याय के खिलाफ जनता की एकजुटता और साहस का प्रतीक है। इसने यह सिद्ध किया कि जब जनता अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो बड़ी से बड़ी सत्ता भी उसके सामने झुकने को मजबूर हो जाती है।
आज भी यह घटना हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा देती है। रवाईं कांड के शहीदों का बलिदान उत्तराखंड की वीरता, संघर्ष और स्वाभिमान की पहचान है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा
