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विश्व गौरैया दिवस: बदलती जीवनशैली में खोती ‘घिंडुड़ी’ की चहचहाहट

हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि उस नन्ही चिड़िया की याद दिलाता है जो कभी हमारे आंगन, छज्जों और खेत-खलिहानों की पहचान हुआ करती थी। 2010 में भारत की नेचर फॉरएवर सोसाइटी द्वारा शुरू किया गया यह अभियान आज वैश्विक स्तर पर गौरैया और अन्य छोटे पक्षियों के संरक्षण का प्रतीक बन चुका है।

 

गौरैया, जिसे पहाड़ों में प्यार से घिंडुड़ी कहा जाता है, कभी हर घर का हिस्सा थी। खासकर उत्तराखंड के पारंपरिक पठाल वाले मकानों में यह आसानी से अपने घोंसले बना लेती थी। सुबह की शुरुआत इसकी चहचहाहट से होती थी और दिनभर यह आंगन में फुदकती नजर आती थी।

पहाड़ों की पुरानी जीवनशैली में गौरैया के लिए भरपूर जगह और भोजन हुआ करता था। जब लोग खेती-बाड़ी करते थे और घरों में ओखली में अनाज कूटा जाता था, तब दाना चुगने के लिए असंख्य गौरैया इकट्ठा हो जाती थीं। गढ़वाली भाषा में इस दृश्य को “घिंडुड़ी की घांण” कहा जाता था—जहां घांण का अर्थ है बहुत अधिक संख्या।

लेकिन समय के साथ यह दृश्य बदल गया। पारंपरिक पत्थर और लकड़ी के घरों की जगह अब सीमेंट के लेंटर वाले मकानों ने ले ली है, जिनमें गौरैया के घोंसले बनाने की जगह नहीं बची। खेती-बाड़ी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, ओखलियां बंद हो चुकी हैं और आंगन सूने पड़ गए हैं। शहरीकरण, प्रदूषण और बदलती जीवनशैली ने गौरैया के अस्तित्व को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कीटों को नियंत्रित करती है और जैव विविधता को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। इसलिए इसका संरक्षण केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आवश्यकता भी है।

विश्व गौरैया दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम अपने आसपास इनके लिए अनुकूल वातावरण बनाएं। घरों की बालकनी या आंगन में दाना-पानी रखें, छोटे घोंसले लगाएं और हर संभव प्रयास करें ताकि यह नन्ही चिड़िया फिर से हमारे जीवन का हिस्सा बन सके।

अगर हम आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां ‘घिंडुड़ी’ को केवल कहानियों और किताबों में ही देख पाएंगी। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी परंपराओं, प्रकृति और इस प्यारी चिड़िया के बीच टूटते रिश्ते को फिर से जोड़ें।

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