राष्ट्रीय

इंटरफेथ हार्मनी सप्ताह का संदेश—‘देव भक्ति अपनी-अपनी, देशभक्ति सब मिलकर करें’: स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। वैश्विक स्तर पर 1 से 7 फरवरी तक मनाए जाने वाले इंटरफेथ हार्मनी सप्ताह के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने मानवता, एकता और समरसता का सशक्त संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह सप्ताह “देव भक्ति अपनी-अपनी, पर देशभक्ति सब मिलकर करें” का दिव्य संदेश देता है और यह आह्वान करता है कि हम अलग-अलग आस्थाओं के होते हुए भी एक राष्ट्र, एक मानवता और एक परिवार हैं।

अमेरिका की धरती से संदेश देते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक चेतना और संस्कृति है, जो पूरी मानवता को अपने हृदय में समेटने का संदेश देती है। भारत की संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संस्कृति है, जहाँ संपूर्ण पृथ्वी को एक परिवार माना गया है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय परंपरा केवल “जियो और जीने दो” तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे आगे बढ़कर “जियो और जीवन दो” का संदेश देती है। हमारी संस्कृति “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का उद्घोष करती है। भारत युद्ध नहीं, योग सिखाता है; संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व सिखाता है; विभाजन नहीं, करुणा और प्रेम का मार्ग दिखाता है।

उन्होंने कहा कि जब तक संसार का अंतिम व्यक्ति सुखी नहीं होता, तब तक हमारी प्रार्थनाएँ अधूरी रहती हैं। आज जब दुनिया में जाति, पंथ, भाषा और मत के नाम पर विभाजन की रेखाएँ गहरी होती जा रही हैं, तब मानवता को फिर से जोड़ने के लिए धर्म की ज्योति को प्रज्ज्वलित करना आवश्यक है। इंटरफेथ हार्मनी सप्ताह हमें याद दिलाता है कि भले ही हमारे मार्ग और पूजा पद्धतियाँ अलग हों, लेकिन हमारी मंज़िल एक ही है—शांति, प्रेम और करुणा।

स्वामी जी ने कहा कि भारत की पावन धरती ने सदियों से “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया है। यहाँ मंदिर की घंटियाँ, मस्जिद की अज़ान, गुरुद्वारे का कीर्तन और चर्च की प्रार्थनाएँ—सभी एक ही स्वर में यह कहती हैं कि मानवता ही सर्वोच्च धर्म है।

उन्होंने संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि जब विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि एक मंच पर बैठकर एक-दूसरे को समझते हैं, तो गलतफहमियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। संवाद शत्रुता को मित्रता में बदल देता है। हमारी विविधता संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि हमारा सौंदर्य है। इंटरफेथ हार्मनी सप्ताह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का उत्कृष्ट अवसर प्रदान करता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आह्वान किया कि धर्म केवल पूजा तक सीमित न रहे, बल्कि मानवता की सेवा, प्रकृति की रक्षा और विश्व शांति का माध्यम बने। उन्होंने कहा कि आज दुनिया को हथियारों की नहीं, संस्कारों की आवश्यकता है; तर्कों की नहीं, करुणा की आवश्यकता है—और यही मानवता का सच्चा मार्ग है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *