“100 वर्ष की संघ यात्रा : सनातन चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रबोध का वैचारिक संगम”
दिल्ली। भारत की सनातन चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रबोध को समर्पित “100 वर्ष की संघ यात्रा – चेतना सुरभि सनातन की” विषय पर आयोजित लाला सीताराम गोयल स्मृति सेमिनार अत्यंत गरिमामय, प्रेरणादायक और वैचारिक ऊँचाइयों से परिपूर्ण रहा। देश के प्रतिष्ठित संतों, विद्वानों, विचारकों एवं समाजसेवियों की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।

सेमिनार का आयोजन एस.आर.चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में किया गया। आयोजन का उद्देश्य सनातन संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की प्रेरणादायक यात्रा को जनमानस तक पहुँचाना रहा।
कार्यक्रम में परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती का पावन सान्निध्य, आशीर्वाद एवं प्रेरक उद्बोधन प्राप्त हुआ। इस अवसर पर डॉ. बजरंग लाल गुप्ता, संजीव गोयल, सुनील विश्वनाथ देवधर तथा सुप्रसिद्ध कवि योगेन्द्र शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति रही। वक्ताओं ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा को सेवा, त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिष्ठा का अनुपम उदाहरण बताया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अपने उद्बोधन में कहा कि “सनातन है तो भारत है, भारत है तो सनातन है और संघ है तो सनातन है।” उन्होंने कहा कि संघ के कार्यकर्ताओं ने स्वयं अपमान सहकर भी देश के स्वाभिमान को जीवित रखा। संघ की शक्ति उसके अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति में निहित है।
उन्होंने कहा कि श्रीराम और रामायण भारतीय जीवन की मर्यादा हैं। श्रीराम केवल ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। आज जब विश्व मूल्य संकट से गुजर रहा है, तब रामायण मानवता के लिए प्रकाशस्तंभ बन सकती है।
वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा सामाजिक पुनर्जागरण की यात्रा है। संघ ने देश के कोने-कोने में सेवा कार्यों के माध्यम से समाज को जोड़ा, संस्कारों को जीवित रखा और राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रज्वलित किया। विपरीत परिस्थितियों में भी संघ ने अपने मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया, यही कारण है कि आज संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बनकर खड़ा है।
सेमिनार में लाला सीताराम गोयल के योगदान को विशेष रूप से स्मरण किया गया। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने इतिहास को सत्य के प्रकाश में प्रस्तुत करने का साहस किया और राष्ट्रवादी चिंतन को बौद्धिक आधार दिया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि विचारों की शक्ति तलवार से अधिक प्रभावशाली होती है।
डॉ. बजरंग लाल गुप्ता ने संघ के बौद्धिक और सांस्कृतिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ ने समाज को आत्मगौरव दिया।
संजीव गोयल ने कहा कि संघ ने समाज को जोड़ने का सतत कार्य किया।
सुनील विश्वनाथ देवधर ने संघ की वैश्विक छवि और राष्ट्रसेवा की भूमिका को रेखांकित किया।
वक्ताओं ने विशेष रूप से युवाओं से आह्वान किया कि वे आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें, क्योंकि भारत का भविष्य सनातन मूल्यों में निहित है।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्र, संस्कृति और सनातन चेतना के प्रति समर्पण के संकल्प के साथ हुआ। इस अवसर पर जगदीश मित्तल, नंद किशोर गर्ग, सुभाष गोयल सहित अनेक गणमान्य विभूतियों का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।
