परमार्थ निकेतन में वेदान्त कोर्स का शुभारम्भ, हिमालय और गंगा तट पर गूंजा आत्मज्ञान का संदेश
ऋषिकेश। हिमालय की गोद में, माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन के दिव्य एवं शांत वातावरण में वेदान्त कोर्स का शुभारम्भ आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर विश्व के अनेक देशों से आए योग साधक, साधिकाएँ एवं आध्यात्मिक जिज्ञासु वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों को आत्मसात करने हेतु एकत्रित हुए।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि वेदान्त केवल दर्शन या बौद्धिक विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। वेदान्त यह स्मरण कराता है कि मनुष्य केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि अनन्त, शाश्वत और दिव्य आत्मा है। जब यह सत्य समझ में आ जाता है, तो भय, तनाव और अशान्ति स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि आज का विश्व भौतिक सुविधाओं से सम्पन्न होते हुए भी आन्तरिक शान्ति के लिए व्याकुल है। ऐसे समय में वेदान्त का सरल और सुन्दर मार्ग मानवता के लिए प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करता है। वेदान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को सुदृढ़ करता है, जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
इस अवसर पर साध्वी भगवती सरस्वती जी ने वेदान्त को अत्यन्त सरल, व्यवहारिक और हृदयस्पर्शी शब्दों में प्रस्तुत करते हुए कहा कि वेदान्त का संदेश है—सुख बाहर नहीं, भीतर है। जब व्यक्ति अपने भीतर के साक्षी भाव को पहचान लेता है, तब जीवन की प्रत्येक परिस्थिति साधना बन जाती है।
साध्वी जी ने कहा कि परमार्थ निकेतन में वेदान्त का अध्ययन केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि योग, ध्यान, सेवा और करुणा के माध्यम से उसे जीवन में उतारा जाता है। वेदान्त की यही विशेषता है कि वह मनुष्य को केवल जानकार ही नहीं, बल्कि जागरूक और करुणामय बनाता है।
वेदान्त कोर्स में अमेरिका, यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों से आए प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। योगाचार्य गायत्री जी के मार्गदर्शन में साधक उपनिषदों, भगवद्गीता एवं अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धान्तों का गहन अध्ययन कर रहे हैं। सत्रों के दौरान आत्मा, कर्म, मोक्ष, अहंकार, माया एवं जीवन के उद्देश्य से जुड़े प्रश्नों पर सार्थक संवाद हुआ, जिनका समाधान पूज्य स्वामी जी एवं साध्वी जी ने सहजता और स्पष्टता के साथ किया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वेदान्त का वास्तविक उद्देश्य जीवन को पवित्र, सरल और सेवा-प्रधान बनाना है। ज्ञान के साथ करुणा और सेवा का समन्वय ही सच्चा आध्यात्म है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी सनातन परम्परा के इस अमूल्य ज्ञान को अपनाकर विश्व में शान्ति और सद्भाव का संदेश फैलाएँ।
परमार्थ निकेतन का यह वेदान्त कोर्स न केवल बौद्धिक ज्ञान प्रदान कर रहा है, बल्कि साधकों को आत्मिक रूप से सशक्त बनाकर संतुलित, जागरूक एवं संवेदनशील जीवन जीने की प्रेरणा भी दे रहा है। माँ गंगा की निर्मल धारा, हिमालय की शान्त उपस्थिति और गुरुओं का सान्निध्य इस कोर्स को और अधिक दिव्य बना रहा है।
अंत में सभी साधकों ने इस पावन अवसर के लिए परमार्थ निकेतन एवं पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और संकल्प लिया कि वे वेदान्त के सुन्दर संदेश को अपने जीवन में अपनाकर विश्व के कोने-कोने तक
