उत्तराखंड के गांधी स्व. इन्द्रमणि बड़ोनी: जन्म शताब्दी पर संघर्ष, त्याग और जनआंदोलन को नमन
पौड़ी। उत्तराखंड की धरती ने अनेक महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, लेकिन स्वर्गीय इन्द्रमणि बड़ोनी का स्थान उनमें विशेष और अद्वितीय है। उन्हें स्नेहपूर्वक “उत्तराखंड का गांधी” कहा जाता है। उनका जीवन सादगी, संघर्ष, त्याग और जनसेवा का प्रतीक रहा। उनकी जन्म शताब्दी केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा, अस्मिता और राज्य आंदोलन की चेतना को पुनः स्मरण करने का अवसर है।

स्वर्गीय इन्द्रमणि बड़ोनी का जन्म 24 दिसंबर 1925 को टिहरी रियासत के अखोड़ी गांव में हुआ। उन्होंने 1949 में देहरादून से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। मात्र 19 वर्ष की आयु में आजीविका की तलाश में वे मुंबई गए, लेकिन शीघ्र ही वापस लौट आए। वर्ष 1953 में गांधीवादी नेता मीरा बहन के गांव आगमन के बाद वे पूर्ण रूप से जनसेवा के मार्ग पर अग्रसर हो गए।
उन्होंने अपने जीवन को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पहाड़ के आम जनमानस की पीड़ा को अपना दर्द बनाया। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पलायन, भाषा और संस्कृति जैसे मुद्दों पर उन्होंने जनआंदोलनों के माध्यम से निरंतर आवाज उठाई।
इन्द्रमणि बड़ोनी का सबसे बड़ा योगदान उत्तराखंड राज्य आंदोलन में रहा। जब पृथक राज्य की मांग को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था, तब उन्होंने शांतिपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया। गांव-गांव जाकर उन्होंने लोगों को यह समझाया कि अलग राज्य केवल प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान और अस्तित्व का प्रश्न है।
उनकी राजनीति सत्ता की नहीं, बल्कि सेवा की राजनीति थी। खादी पहनना, सादा जीवन जीना और आम लोगों के बीच बैठकर संवाद करना उनकी पहचान थी। इसी कारण उन्हें उत्तराखंड का गांधी कहा गया। उन्होंने कभी पद, प्रतिष्ठा या निजी लाभ की आकांक्षा नहीं की।
राजनीतिक जीवन में वे 1961 में ग्राम प्रधान बने तथा बाद में जखोली ब्लॉक के प्रमुख रहे। वर्ष 1967 में देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1969 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में विधायक बने। 1974 में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, जबकि 1977 में पुनः निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा पहुंचे। उस समय जनता पार्टी की प्रचंड लहर के बावजूद उनके सभी प्रतिद्वंद्वियों की जमानत जब्त हो गई थी।
वर्ष 1979 से उन्होंने पृथक उत्तराखंड राज्य की लड़ाई को और तेज किया तथा 25 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना की। 1989 में वे लोकसभा चुनाव में पराजित हुए, लेकिन आंदोलन से उनका संकल्प कमजोर नहीं पड़ा।
वर्ष 1994 में पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर उन्होंने पौड़ी में आमरण अनशन शुरू किया, जिसके बाद उन्हें मुजफ्फरनगर जेल भेज दिया गया। आंदोलन के दौरान अनेक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन बड़ोनी जी ने अहिंसक आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। उनके अटूट विश्वास और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए द वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें “माउंटेन गांधी (पर्वतीय गांधी)” के रूप में संबोधित किया।
राज्य गठन के बाद भी उनकी चिंता समाप्त नहीं हुई। वे लगातार यह प्रश्न उठाते रहे कि क्या राज्य बनने से पहाड़ के लोगों का जीवन वास्तव में बदला है। पलायन, बेरोजगारी, संसाधनों के असमान उपयोग और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषयों पर उन्होंने सदैव जनहित की बात कही।
18 अगस्त 1999 को ऋषिकेश के विट्ठल आश्रम में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। स्वर्गीय इन्द्रमणि बड़ोनी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक विचार थे—और विचार कभी मरते नहीं। उनकी जन्म शताब्दी हमें यह संदेश देती है कि बड़ा परिवर्तन सादगी, सत्य और जनसंवाद से ही संभव है, और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
