“मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता सनातन भारत की शाश्वत धरोहर”
ऋषिकेश। मानव अधिकार दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का विचार कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि सनातन भारत की प्राचीन और शाश्वत धरोहर है। उन्होंने कहा कि मानव अधिकारों का मूल भाव भारतीय संस्कृति और परंपराओं में सदियों से रचा-बसा है, जिसे आज विश्व भी स्वीकार कर रहा है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने बताया कि मानव अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय बहसें भले ही पिछली कुछ शताब्दियों में तेज हुई हों, लेकिन भारत ने हजारों वर्ष पहले “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश मानवता को दिया था। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “मानव मात्र के प्रति करुणा” जैसे आदर्श भारतीय सभ्यता का आधार रहे हैं, जो हर व्यक्ति के सम्मान और समान अधिकारों की ओर संकेत करते हैं।
उन्होंने कहा कि मानव अधिकार केवल कानून या संविधान में लिखी गई बातें नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए। “यदि हम दैनिक जीवन में करुणा, सहानुभूति, समान अवसर और सम्मान का पालन करें तो किसी कानून की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी,” उन्होंने कहा।
स्वामी सरस्वती ने पर्यावरण संरक्षण को भी मानव अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि स्वच्छ व सुरक्षित पर्यावरण हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि प्रकृति की सुरक्षा ही आने वाली पीढ़ियों के मानवाधिकारों की रक्षा है।
उन्होंने समाज से आग्रह किया कि मानव अधिकारों की अवधारणा को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे जीवन का स्थायी संकल्प बनाया जाए। स्वामी सरस्वती ने लोगों को मानवता, सहअस्तित्व, प्रेम और समानता की भावना को बढ़ावा देने का संदेश देते हुए कहा कि यही भारत की आत्मा है और यही विश्व को एक सुंदर भविष्य दे सकती है।
