तमलाग (पट्टी गगवाड़स्यूं) का पौराणिक “ मौरी”—आस्था, परंपरा और पांडव लीला का अनूठा संगम
पौड़ी। गढ़वाल की सांस्कृतिक विरासत अपने लोकनृत्यों, मेलों और परंपराओं के कारण आज भी जीवंत है। इन्हीं दुर्लभ और प्राचीन परंपराओं में से एक है ग्राम तमलाग, पट्टी गगवाड़स्यूं, पौड़ी गढ़वाल में लगने वाला मौरी—एक अनूठा आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन, जो हर बारह साल में छह महीनों तक चलता है।

कब और कैसे लगता है मोरी?
मौरी का आयोजन दिसंबर से जून तक किया जाता है। यह कोई एक-दो दिन का पर्व नहीं, बल्कि महीनों तक चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव है, जिसमें गांव का समूचा समुदाय शामिल रहता है।
इस वर्ष 7 दिसंबर से मोरी का शुभारंभ हो रहा है, जिसकी तैयारियाँ ग्रामीणों द्वारा पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ की जा रही हैं।
पांडव लीला पर आधारित अनूठी परंपरा
मौरी का सबसे प्रमुख तत्व है पांडव लीला, जिसमें पांचों पांडवों के साथ कुंती और द्रौपदी की वार्ताएँ प्रस्तुत की जाती हैं।
यह वार्ताएँ केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि लोककथाओं, संस्कृति और इतिहास को संजोने का माध्यम भी हैं। ग्रामीण कलाकार पारंपरिक वस्त्रों में अपनी भूमिका निभाते हैं और पूरी लीला ढोल-दमाऊ की ताल पर आगे बढ़ती है।
पौराणिक मान्यता – पांडवों का यहाँ प्रवास
माना जाता है कि वनवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र में रुके थे, और उसी पौराणिक पृष्ठभूमि के कारण यहां मोरी मनाई जाती है।
कहानी, आस्था और लोकविश्वास के इस संगम ने मौरी को एक अद्वितीय पहचान दी है।
भैरव मंदिर—लोक आस्था का केंद्र
गांव के भैरों मंदिर में होने वाली पूजा और अनुष्ठान मौरी का अभिन्न हिस्सा हैं।
ढोल-दमाऊ की धुनों के साथ ग्रामीण मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं, जहां आस्था, संस्कृति और सामूहिकता का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है।
संस्कृति की धरोहर को संजोने वाला मेला
मौरी सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि गढ़वाल की सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखने वाला सांस्कृतिक महोत्सव है।
यहां ग्रामीण अपनी पहचान, लोककला, लोकगाथाओं और नृत्य-संगीत के ज़रिये अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।
