बिछला ढांगू में गेहूं की बुवाई शुरू, लेकिन जंगली जानवर बने किसानों के लिए बड़ी मुसीबत
द्वारीखाल। द्वारीखाल ब्लॉक की बिछला ढांगू पट्टी के हथनूड़, कोठार, पोगठा, मैठाणा और कैण्डुल गांवों में आज भी ग्रामीण परंपरागत खेती को जीवित रखे हुए हैं। इन दिनों क्षेत्र में गेहूं, जौ, मटर, चना और सरसों की बुवाई का दौर चल रहा है। लेकिन खेती में लगने वाली मेहनत और लागत के बावजूद ग्रामीणों को जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा को लेकर गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि खेतों में बोया गया बीज तैयार होने से पहले ही जंगली सूअर, बंदर और अन्य जानवर फसल को भारी नुकसान पहुंचा देते हैं, जिससे उनकी महीनों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। खेतों की रखवाली के लिए किसानों को दिन-रात खेतों की रखवाली करनी पड़ती है, जिसके कारण खेती अब लाभ का नहीं बल्कि संघर्ष का विषय बन गई है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व फौजी बीरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में खेती करना पहले ही कठिन है, लेकिन इससे भी अधिक मुश्किल है फसलों को जंगली जानवरों से बचाना। उन्होंने कहा—“खेती में बीज, निराई-गुड़ाई, हल आदि पर होने वाले खर्चे से कहीं अधिक समय और मेहनत खेतों को जंगली जानवरों से बचाने में लग जाता है। बीज बोने से लेकर अन्न को सुखाकर घर तक लाने तक सुरक्षा करना लोहे के चने चबाने जैसा हो गया है। इसी वजह से लोग खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं और पलायन बढ़ रहा है।”
उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की कि इलाके में फेंसिंग और घेरबाड़ की पुख्ता व्यवस्था की जाए, ताकि किसान अपनी फसलों की सुरक्षा कर सकें और खेती को लाभकारी बनाया जा सके।
बीरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि यदि सरकार पहाड़ी किसानों की फसल सुरक्षा पर ठोस कदम उठाती है, तो खेती फिर से ग्रामीणों के लिए सम्मान और आय का स्रोत बन सकती है।
क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों ने भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जल्द ही समाधान नहीं निकला तो पर्वतीय खेती पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगी।
