उत्तराखंड राज्य स्थापना की रजत जयंती पर विशेष रिपोर्ट
राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी अधूरी हैं जनभावनाएं — पलायन, बेरोजगारी और राजधानी का सवाल अब भी कायम
पौड़ी/द्वारीखाल। उत्तराखंड राज्य की मांग पर्वतीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और वहां की मूलभूत समस्याओं को ध्यान में रखकर की गई थी। राज्य आंदोलन के दौरान जनता की प्रमुख मांग थी कि अलग राज्य बनने से स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार होगा और विकास गांव-गांव तक पहुंचेगा।

“पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी जब तक पहाड़ में नहीं रुकेगा, तब तक यहां का विकास नहीं हो सकता।”
— स्वर्गीय शिवानंद नौटियाल, शिक्षाविद्
यह विचार आज भी पर्वतीय जनमानस के दिलों में गूंजता है, क्योंकि राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी यह लक्ष्य अधूरा दिखाई देता है।
राज्य बनने के बाद बढ़ा पलायन, बंजर होते खेत
राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और पलायन थमेगा। किंतु वास्तविकता उलटी रही। हजारों गांव खाली हो गए, खेत बंजर हो गए। जहां कभी फसलें लहलहाती थीं, अब वहां झाड़ियां और जंगली पौधे फैल गए हैं।
जंगली जानवरों का आतंक और किसानों की चिंता
पलायन और खेती की उपेक्षा के बीच जंगली जानवरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। सूअर, बंदर, भालू, गुलदार जैसी प्रजातियां फसलों को नष्ट कर रही हैं। कई बार ये जानवर लोगों और पालतू पशुओं पर हमला भी कर रहे हैं। ग्रामीणों में भय और असुरक्षा का माहौल है।

भू-माफिया, खनन माफिया और नशा माफिया का बढ़ता प्रभाव
राज्य की प्राकृतिक संपदा अब भू-माफिया, खनन माफिया और नशा माफिया के शिकंजे में जकड़ती जा रही है। बाहरी राज्यों से लोग आकर बस रहे हैं, जिससे मूल निवासियों की पहचान और संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है।
अवैध खनन से नदियां सूख रही हैं, पहाड़ों का स्वरूप बिगड़ रहा है और पर्यावरण संतुलन डगमगा गया है।
राजधानी का मुद्दा अब भी अधर में
राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी स्थायी राजधानी का प्रश्न अनुत्तरित है।
गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग आज भी जनभावनाओं के केंद्र में है, लेकिन सरकारें केवल घोषणाओं और समितियों तक ही सीमित रहीं।
राजधानी को लेकर लोगों में असंतोष और उपेक्षा की भावना स्पष्ट दिखती है।
जनभावनाओं की कसौटी पर राज्य का विकास
सड़क, बिजली और संचार में सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में विकास नाकाफी है।
पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योग, कृषि आधारित रोजगार और स्थानीय बाजारों का अभाव अब भी है। युवाओं का पलायन बदस्तूर जारी है।
संघर्ष और बलिदान से बना उत्तराखंड
यह राज्य खैरात में नहीं मिला, बल्कि यह 42 शहीदों की कुर्बानियों और हजारों आंदोलनकारियों के संघर्षों का परिणाम है।
महिलाओं ने आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई, किंतु उन्हें भी पुलिस उत्पीड़न और अमानवीय घटनाओं का सामना करना पड़ा।
उन बलिदानों की याद आज भी उत्तराखंड की आत्मा में बसी है।
रजत जयंती पर उठता सवाल
“क्या यही वह उत्तराखंड है जिसकी कल्पना हमारे शहीद आंदोलनकारियों ने की थी?”
राज्य की रजत जयंती के अवसर पर जनता फिर से सोच रही है—
कब आएगा वह दिन जब पलायन रुकेगा, खेत हरे होंगे, रोजगार गांवों में मिलेगा, और राजधानी सच में पहाड़ में होगी।
