ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आज भारतीय संस्कृति के महान संत, आदिकवि और समाज के मार्गदर्शक महर्षि वाल्मीकि जी की जयंती श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाई गई। इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने महर्षि वाल्मीकि जी की पुण्य स्मृति को नमन करते हुए कहा कि वे केवल एक कवि या ऋषि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के आदर्शों के अमर प्रतीक हैं।

स्वामी जी ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि ने अपने अद्वितीय ज्ञान, तप और साधना से मानवता को ‘रामायण’ जैसा अमूल्य ग्रंथ प्रदान किया, जो न केवल एक महाकाव्य है, बल्कि जीवन के हर पहलू के लिए मार्गदर्शन का स्रोत भी है। इसमें वर्णित प्रभु श्रीराम जी की प्रेरणादायक कथाएँ धर्म, सत्य, करुणा, साहस और मानवीय मूल्यों का संदेश देती हैं।
उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी का जीवन हमें आध्यात्मिक जागृति, करुणा और मानवता के उच्च आदर्शों का संदेश देता है। उनके द्वारा रचित रामायण का प्रत्येक प्रसंग जीवन के नैतिक मूल्यों, कर्तव्यनिष्ठा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की प्रेरणा प्रदान करता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज के समय में जब समाज में नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना की आवश्यकता बढ़ रही है, तब महर्षि वाल्मीकि जी की शिक्षाएँ पहले से अधिक प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे वाल्मीकि-रामायण के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएँ और अपने आचरण में सत्य, धर्म, करुणा और सेवा के सिद्धांतों को शामिल करें।
उन्होंने कहा कि यदि हम महर्षि वाल्मीकि जी के आदर्शों पर चलें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन समृद्ध होगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी उनके उपदेशों से प्रेरित होकर सदाचार, सहिष्णुता और मानवता के मार्ग पर अग्रसर होंगे।
अंत में परमार्थ निकेतन परिवार की ओर से महर्षि वाल्मीकि जी को कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई। स्वामी जी ने कामना की कि उनकी अमर रचना रामायण सदा मानवता को सत्य, धर्म और सेवा के पथ पर चलने की प्रेरणा देती रहे।
