उत्तराखंड राज्य आंदोलन और मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी : क्या यही सपना था शहीदों का?
आज 2 सितम्बर को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का सबसे काला दिन याद किया जाता है—मसूरी गोलीकांड। यह वही दिन था जब राज्य की मांग कर रहे शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर गोलियाँ बरसाई गईं और कई निर्दोषों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। शहीदों का बलिदान ही था जिसने पूरे पहाड़ को झकझोर दिया और उत्तराखंड राज्य की मांग को अडिग संकल्प बना दिया।
2 सितम्बर 1994 को मसूरी में पुलिस की गोलियों से 6 आंदोलनकारी शहीद हुए—
मसूरी गोलीकांड के अमर शहीद
रायसिंह बंगारी, धनपत सिंह, बलबीर सिंह नेगी, मनमोहन ममगाई, बेलमती चौहान, हंसा धनाई
इन सभी वीरों का बलिदान ही उत्तराखंड राज्य की नींव बना।
शहीदों का सपना और आज की हकीकत
शहीदों ने एक ऐसे उत्तराखंड की कल्पना की थी जहाँ गांव बसें, नौजवान अपने घर में रोजगार पाएं, खेती और कुटीर उद्योग समृद्ध हों, शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएँ हर द्वार तक पहुँचे और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो। पर आज की सच्चाई बिल्कुल अलग है।
गैरसैण, जिसे स्थायी राजधानी बनाने का संकल्प शहीदों की आत्माओं को शांति देता, आज तक महज़ एक झुनझुना बनकर रह गया है। पहाड़ों के गांव खाली हो रहे हैं, पलायन लगातार बढ़ रहा है। खेत बंजर हैं, खेती छोड़कर लोग मजदूरी और पलायन को मजबूर हैं।
आज पहाड़ों के गाँव लंगूर, बंदर, सूअर और गुलदार के आतंक से त्रस्त हैं। गांव के बच्चे स्कूल तक जाने में भयभीत रहते हैं, महिलाएँ खेत-खलिहान में सुरक्षित नहीं। प्राकृतिक संसाधनों की लूट माफिया के हाथों में है—खनन माफिया, भू-माफिया और भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं।
जहाँ कभी शहीदों ने लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित की रक्षा के लिए अपने सीने पर गोलियाँ खाईं, वहीं आज बढ़ते अपराध, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने राज्य की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है।
क्या यही सपना था?
शहीदों का सपना एक ऐसा उत्तराखंड था जो विकास और संस्कृति का आदर्श बनता। लेकिन आज जब गांव उजड़ रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, और नेता कुर्सियों की राजनीति में उलझे हैं, तो यही सवाल गूंजता है—क्या यही सपना था शहीदों का?
आज जरूरत है कि हम शहीदों के बलिदान को सिर्फ स्मरण न करें बल्कि उनके सपनों के उत्तराखंड को साकार करने का संकल्प लें।
गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने का साहसिक निर्णय लिया जाए।
सुदूरवर्ती गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सुविधाएँ पहुँचे।
पलायन रोकने के लिए स्थानीय उद्योग, कुटीर रोजगार और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाए।
भ्रष्टाचार, खनन और भू-माफिया पर कठोर अंकुश लगे।
पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और अस्मिता की रक्षा हो।
मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी पर हमें आत्ममंथन करना होगा। शहीद बृजभूषण सिंह, राघवेन्द्र सिंह, बलवीर सिंह नेगी, दलीप सिंह, मनोज रावत, गोविन्द सिंह और कुलदीप सिंह सहित सभी अमर बलिदानियों ने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर यह राज्य दिलाया। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि उनके सपनों का उत्तराखंड बनाएं—एक ऐसा उत्तराखंड जो पलायन, भय और भ्रष्टाचार से मुक्त हो और जहाँ हर पहाड़ी गर्व से कह सके—“हाँ, यही है शहीदों का सपना।”
