उत्तराखंडऋषिकेश

नागपंचमी: प्रकृति, सहअस्तित्व और श्रद्धा का पर्व

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने दिया पर्यावरण और सहअस्तित्व का संदेश

ऋषिकेश। नागपंचमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन से समस्त श्रद्धालुओं को शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए परमार्थ आध्यात्मिक प्रमुख स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि यह पर्व न केवल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि सनातन संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा को भी उजागर करता है, जो सम्पूर्ण सृष्टि के साथ सह-अस्तित्व, संवेदना और सामंजस्य का संदेश देती है।

स्वामी जी ने कहा कि नागों का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। भगवान शिव ने वासुकी नाग को गले में धारण कर और भगवान विष्णु ने शेषनाग पर शयन कर यह दर्शाया कि नाग शक्ति, संतुलन और धैर्य के प्रतीक हैं। धर्मग्रंथों में कद्रू के पुत्रों से लेकर तक्षक, वासुकी और कर्कोटक जैसे नागों का वर्णन हमें उनके दिव्य स्वरूप की याद दिलाता है।

उन्होंने बताया कि नागपंचमी का पर्व वर्षा ऋतु के दौरान आता है, जब जलभराव के कारण सर्पों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होता है। ऐसे समय में नागों की पूजा केवल आस्था नहीं, बल्कि उनके संरक्षण का संकल्प भी है। यह पर्व हमें प्रकृति के पंचतत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता रखने का अवसर देता है।

स्वामी चिदानन्द जी ने कहा कि योग परंपरा में नाग ‘कुंडलिनी शक्ति’ के प्रतीक हैं, जो मानव चेतना के चक्रों को जागृत कर आत्मबोध की ओर ले जाती है। नागपंचमी का पर्व आध्यात्मिक ऊर्जा और शुभता का उत्सव है।

वर्तमान समय में, जब पृथ्वी जलवायु परिवर्तन और जैवविविधता ह्रास जैसी समस्याओं से जूझ रही है, नागपंचमी हमें सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का गहन संदेश देती है। स्वामी जी ने कहा, “यदि हम हर प्राणी, पेड़-पौधे, नदियों और जीवन के प्रत्येक रूप के प्रति करुणा नहीं रखेंगे, तो हमारी अपनी अस्तित्व श्रृंखला टूट जाएगी।”

स्वामी जी ने आह्वान किया कि नागपंचमी के अवसर पर हम केवल पूजा तक सीमित न रहें, बल्कि धरती के समस्त जीवों के प्रति संवेदनशीलता, दया और करुणा का भाव अपनाएँ। यही सनातन धर्म की सच्ची साधना है।

अंत में, उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे इस पर्व को संवर्धन, सह-अस्तित्व और सेवा का संकल्प बनाकर मनाएँ। नागदेवता की पूजा, प्रकृति के साथ हमारी एकता की प्रतीक है।

“सभी जीवों में ईश्वर का दर्शन ही सच्चा

धर्म है।” – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

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