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एआई का बढ़ता प्रभाव: भारतीय आईटी सेक्टर में नौकरियों का नया संकट

नई दिल्ली, 20 जुलाई 2025
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र, जो वर्षों से देश की आर्थिक प्रगति का एक मजबूत स्तंभ रहा है, आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की वजह से बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। एआई के उपयोग से जहाँ कार्यप्रणाली में तीव्रता और दक्षता बढ़ी है, वहीं कई पारंपरिक नौकरियों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, कस्टमर सर्विस, डेटा प्रोसेसिंग, और बीपीओ जैसी भूमिकाएं अब एआई के कारण तेजी से ऑटोमेट हो रही हैं, जिससे हजारों कर्मचारियों के सामने नौकरी की असुरक्षा खड़ी हो गई है।


आईटी कंपनियों में एआई के कारण हो रहा ढांचा परिवर्तन

1. टीसीएस की नई बेंच पॉलिसी

भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस ने हाल ही में अपनी बेंच नीति में बदलाव किया है। इस नई नीति के तहत यदि कोई कर्मचारी 35 दिनों से अधिक समय तक बिना किसी प्रोजेक्ट पर रहता है, तो कंपनी उसे निकाल सकती है या उसका करियर ग्रोथ रोक सकती है। इस नीति से हज़ारों कर्मचारियों में डर का माहौल बन गया है।

2. इंफोसिस में भर्तियों पर रोक और आंतरिक मूल्यांकन

इन्फोसिस ने साल की शुरुआत में लगभग 300 से अधिक फ्रेश ग्रेजुएट्स की भर्तियों को रोक दिया क्योंकि वे तकनीकी परीक्षणों में सफल नहीं हो पाए। इसके अलावा, पहले से चयनित 240 से अधिक उम्मीदवारों की नियुक्तियां रद्द कर दी गईं। कंपनी ने इसके पीछे तकनीकी कुशलता की कमी और एआई टूल्स की बढ़ती भूमिका को जिम्मेदार ठहराया।

3. विप्रो की “AI First” नीति

विप्रो ने अपनी नई नीति “AI First” के तहत घोषणा की है कि भविष्य में कंपनी के सभी प्रोजेक्ट्स में एआई का प्राथमिक उपयोग किया जाएगा। इसके चलते कंपनी ने 5000 से अधिक नई भर्तियों को रोक दिया है और मौजूदा कर्मचारियों को एआई और मशीन लर्निंग में प्रशिक्षित करने पर जोर दिया जा रहा है।

4. एचसीएल टेक द्वारा जनरेटिव एआई लैब की स्थापना

एचसीएल टेक ने बेंगलुरु में एक जनरेटिव एआई लैब की स्थापना की है, जिसमें कंपनी दस्तावेज़ निर्माण, टेस्टिंग, कस्टमर सपोर्ट और सॉफ्टवेयर मेंटेनेंस जैसे कार्य पूरी तरह एआई के जरिए करा रही है। इस कदम से परिचालन लागत में तो कमी आई है, लेकिन मैनुअल कार्यों से जुड़े कर्मचारियों की भूमिकाएं समाप्त हो रही हैं।

5. टेक महिंद्रा का “AI Buddy” टूल

टेक महिंद्रा ने “AI Buddy” नाम का एक टूल लॉन्च किया है जो कोड जनरेशन, ऑटोमैटिक डॉक्यूमेंटेशन और क्लाइंट क्वेरी रिस्पॉन्स में सहायक है। इसके कारण कई डेवलपर रोल्स में कटौती की जा रही है क्योंकि ये कार्य अब एआई आसानी से कर पा रहा है।


उत्पादन में वृद्धि, लेकिन नौकरियों में कटौती

एक अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, जनरेटिव एआई से आने वाले पांच वर्षों में भारत के आईटी उद्योग की उत्पादकता में 40 से 45 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। लेकिन इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर साल लगभग 5 प्रतिशत पारंपरिक तकनीकी भूमिकाएं समाप्त हो जाएंगी। विशेषकर, बीपीओ, कस्टमर सपोर्ट और एंट्री-लेवल कोडिंग जैसे क्षेत्रों में यह प्रभाव सबसे अधिक है।

आईटी सेक्टर में एआई के कारण उत्पादकता तो बढ़ रही है, लेकिन कंपनियों को कम मानव संसाधन की जरूरत महसूस हो रही है। इससे भर्ती प्रक्रिया धीमी हो गई है और अनेक कर्मचारियों को बिना काम के “बेंच” पर बैठना पड़ रहा है।


महत्वपूर्ण घटनाएं जो एआई प्रभाव को दर्शाती हैं

इंफोसिस छंटनी विवाद

मार्च 2025 में इन्फोसिस ने अपने कुछ टेक्निकल हायरिंग टेस्ट के फेल होने वाले उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र न देने का निर्णय लिया। इसके अलावा, कंपनी ने अपने कई प्रोजेक्ट्स में ऑटोमेशन लागू किया जिसके चलते लगभग 500 कर्मचारियों की भूमिकाएं समाप्त हो गईं।

विप्रो में पुनर्गठन और छंटनी

विप्रो ने अप्रैल 2025 में अपनी “AI First” रणनीति के तहत लगभग 350 कर्मचारियों को निकाला। इन कर्मचारियों में अधिकांश ऐसे थे जो पारंपरिक कोडिंग और टेस्टिंग कार्यों में लगे थे।

गुपशप और स्टार्टअप्स में छंटनी

जनवरी 2025 से लेकर मई 2025 के बीच कई स्टार्टअप्स जैसे गुपशप, जॉपर आदि ने एआई टूल्स के प्रयोग के कारण अपने कर्मचारियों की संख्या में कटौती की। गुपशप ने करीब 500 कर्मचारियों को बाहर कर दिया, जिनमें से अधिकांश तकनीकी विभाग से जुड़े थे।


विशेषज्ञों की राय: डर और दिशा दोनों

डॉ. ए वेलुमणि (थायरोकेयर संस्थापक)

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “एआई सिर्फ आईटी की नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि हर क्षेत्र के लिए खतरा है। हमें यह मानना होगा कि अब किसी भी क्षेत्र की नौकरी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।”

एन.आर. नारायण मूर्ति (इंफोसिस सह-संस्थापक)

मूर्ति ने एक इंटरव्यू में कहा कि एआई रोजगार समाप्त नहीं करेगा बल्कि नई भूमिकाओं को जन्म देगा। “इतिहास गवाह है कि जब भी नई तकनीक आई है, उसने नई नौकरियों का सृजन किया है। यह बदलाव उसी दिशा में एक कदम है।”

श्रीधर वेंबु (जोहो के संस्थापक)

श्रीधर वेंबु का मानना है कि जो इंजीनियर एआई आधारित तकनीकों को नहीं अपनाएंगे, वे भविष्य में पीछे छूट जाएंगे। उन्होंने एआई को “समान अवसर देने वाला लेकिन खतरनाक उपकरण” बताया।


सरकार और शिक्षा क्षेत्र की भूमिका

सरकार ने हाल ही में ‘IndiaAI मिशन’ की शुरुआत की है, जिसके तहत अगले 5 वर्षों में 10 लाख युवाओं को एआई और डेटा साइंस में प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, स्किल इंडिया और NASSCOM द्वारा चलाए जा रहे “FutureSkills Prime” जैसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं और कर्मचारियों को एआई, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग आदि में प्रशिक्षित किया जा रहा है।

CSC (कॉमन सर्विस सेंटर) नेटवर्क के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत 5.5 लाख उद्यमियों को भी मुफ्त एआई प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है।


कौन से पद खत्म हो रहे हैं और कौन से बन रहे हैं?

खतरे में

  • डेटा एंट्री ऑपरेटर
  • मैनुअल टेस्टिंग इंजीनियर
  • कस्टमर सर्विस एक्जीक्यूटिव
  • फ्रेशर कोडर
  • सपोर्ट असिस्टेंट्स

नए अवसर

  • एआई आर्किटेक्ट
  • मशीन लर्निंग इंजीनियर
  • डेटा साइंटिस्ट
  • एआई इथिक्स ऑफिसर
  • NLP (नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग) विशेषज्ञ
  • प्रॉम्प्ट इंजीनियर

शिक्षा और अपस्किलिंग की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि जो कर्मचारी एआई और संबंधित तकनीकों में अपनी दक्षता बढ़ाएंगे, उनके लिए करियर की संभावनाएं पहले से अधिक खुलेंगी। इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि छात्र और कार्यरत कर्मचारी AI, ML, Data Science, और Automation जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लें।

भारत के कई प्रमुख संस्थानों जैसे IITs, IIITs, और निजी विश्वविद्यालयों ने एआई आधारित कोर्स और माइक्रो डिग्री प्रोग्राम्स शुरू किए हैं। इसके अलावा, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स जैसे कोर्सेरा, अपग्रेड, उडेमी इत्यादि के जरिए भी एआई सीखना अब पहले से अधिक आसान और सुलभ हो गया है।


फ्यूचर ऑफ वर्क: क्या आएगा आगे?

AI केवल एक तकनीक नहीं बल्कि एक नई आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की नींव बनती जा रही है। आने वाले वर्षों में AI, 5G, क्लाउड टेक्नोलॉजी और क्वांटम कंप्यूटिंग मिलकर काम के स्वरूप को पूरी तरह बदल देंगे।

आईटी कंपनियों में “ह्यूमन प्लस AI” मॉडल को अपनाया जा रहा है, जहाँ एआई कर्मचारियों की क्षमताओं को बढ़ाने में सहायक होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी मौजूदा भूमिकाएं बची रहेंगी।


निष्कर्ष: चुनौती के साथ अवसर

एआई के आने से भारतीय आईटी उद्योग में एक युगांतरकारी परिवर्तन हो रहा है। यह परिवर्तन कुछ के लिए संकट लेकर आ रहा है, तो कुछ के लिए सुनहरा अवसर बनकर उभर रहा है। जो कर्मचारी या युवा समय रहते खुद को अपस्किल करेंगे, वे इस बदलाव में अग्रणी बनेंगे। लेकिन जो इस बदलाव को नजरअंदाज करेंगे, उनके लिए यह संकट और असुरक्षा का कारण बन सकता है।

अब समय आ गया है कि कंपनियाँ, सरकारें, शिक्षण संस्थान और कर्मचारी—सभी मिलकर इस परिवर्तन को सकारात्मक दिशा दें। यदि हम सामूहिक रूप से कौशल विकास, नैतिकता और समावेशी प्रौद्योगिकी की ओर बढ़ें, तो यह संकट अवसर में बदल सकता है।

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