सिंगटाली पुल के नाम पर जनता के साथ पिछले 20 वर्षों से लगातार हो रहा है छलावा -: वी पी भट्ट “सलाणी”
*सिंगटाली मोटरपुल संघर्ष समिति ने सरकार को दिया 15 दिन का अल्टीमेटम। सकारात्मक परिणाम नहीं आए तो बदरीनाथ हाइवे पर होगा चक्काजाम*
यमकेश्वर। ऋषिकेश बदरीनाथ मोटर मार्ग बनने से पहले बदरी केदार की यात्रा पैदल होती थी। यात्री अपने साथ सत्तू लेकर चलते थे, यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले गांवों के लोग यात्रियों को भोजन एवं रात को ठहरने के लिए जगह देते थे। बाद में बाबा काली कमली ने ऋषिकेश से बद्रीनाथ तक 32 चट्टियों का निर्माण किया हर चट्टी में एक धर्मशाला होती थी सेवादार होते थे, यात्रियों को गुड़ चना और भोजन का भी प्रबंध होता था।

ऋषिकेश के बाद गरुड़ चट्टी, मोहन चट्टी के बाद नौढखाल में प्याऊ एवं धर्मशाला थी। इसके बाद महादेव चट्टी, व्यास चट्टी होते हुए यात्री देवप्रयाग पहुंचते थे। मोटरमार्ग बनने के बाद द्वारीखाल एवं यमकेश्वर ब्लॉक का यह क्षेत्र उपेक्षित हो गया। गंगापार जनपद टिहरी वाला क्षेत्र यात्रा मार्ग के कारण विकसित होता गया वहां पर लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने लगा जिससे वहां पर पलायन भी कम हुआ।
जब तक सिलोगी गैंड़खाल मोटरमार्ग ऋषिकेश नहीं जुड़ा था ढांगू एवं लंगूर पट्टी के लोग झैड़, कूला, खैड़ा होते हुए सिंगटाली झूलापुल पार करके ऋषिकेश पहुंचते थे।
यमकेश्वर विकास समिति के संस्थापक सदस्य वी पी भट्ट “सलाणी” ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से हर चुनाव में, सिंगटाली (कौड़ियाला) में 75 वर्ष पुराने जीर्ण-शीर्ण झूला पुल की जगह, गढ़वाल मंडल से कुमाऊं मंडल तक, करीब आठ विधानसभाओं के हजारों गांवों को सड़क यातायात की सुविधा से जोड़ने वाला सिंगटाली मोटर पुल बनाने का झूठा आश्वासन और भूमिपूजन की नौटंकी करके भाजपा नेता यमकेश्वर से चुनाव जीतते आ रहे हैं।
27 अप्रैल 2025 को “सिंगटाली मोटर पुल संघर्ष समिति” के आह्वान पर, आयोजित धरना-प्रदर्शन में “यमकेश्वर विकास समिति” और अनेक सामाजिक, राजनैतिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भी सरकार के विरुद्ध एकदिवसीय धरना-प्रदर्शन को पूर्ण समर्थन दिया।

शीघ्र मोटर पुल निर्माण की सकारात्मक कार्यवाही के लिए जिलाधिकारी के माध्यम से उत्तराखंड सरकार को 15 दिनों के अल्टीमेटम के साथ ज्ञापन दिया गया है। यदि इस समय सीमा के अंदर सकारात्मक परिणाम नहीं निकला तो, सिंगटाली मोटर पुल संघर्ष समिति के साथ “यमकेश्वर विकास समिति” के कार्यकर्ता हाईवे पर चक्काजाम, धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन के लिए बाध्य होंगे जिसकी पूरी जिम्मेदारी उत्तराखंड शासन प्रशासन की होगी।
