अंतर्राष्ट्रीय

जी20 अंतरधार्मिक मंच पर साध्वी भगवती सरस्वती ने दिया विश्वशांति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश

अमेरिका के ऐतिहासिक सॉल्ट लेक टैबरनेकल में उद्घाटन समारोह को किया संबोधित, करुणा, मानवता और साझा भविष्य के लिए एकजुट होने का आह्वान

सॉल्ट लेक सिटी (अमेरिका)। परमार्थ निकेतन की अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध सॉल्ट लेक टैबरनेकल में आयोजित जी20 अंतरधार्मिक मंच के वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में विशेष संबोधन दिया। हजारों लोगों की उपस्थिति में उन्होंने विश्व समुदाय से आस्था को आशा, करुणा, मानवीय गरिमा और विश्वशांति की सक्रिय शक्ति बनाने का आह्वान किया। ‘अविचल आशा, साझा भविष्य’ विषय पर अपने संबोधन में उन्होंने भारत की प्राचीन सनातन एवं वैदिक परंपरा के सार्वभौमिक संदेश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को वैश्विक सद्भाव और मानवता के उज्ज्वल भविष्य का आधार बताया।

समारोह में जी20 अंतरधार्मिक मंच के कार्यकारी निदेशक डॉ. व्हिटनी क्लेटन, दक्षिण कैरोलिना के पूर्व गवर्नर एवं संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के पूर्व कार्यकारी निदेशक डेविड बीजली, अमेरिका के प्रसिद्ध नागरिक अधिकार नेता डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पुत्र मार्टिन लूथर किंग तृतीय और उनकी पत्नी सहित विभिन्न धर्मों, आध्यात्मिक परंपराओं तथा वैश्विक संस्थाओं के अनेक प्रतिष्ठित प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

नवरात्रि के पावन अवसर पर अंतरराष्ट्रीय मंच से साध्वी भगवती सरस्वती ने भारतीय सनातन संस्कृति की समन्वयकारी चेतना को प्रस्तुत करते हुए नारी शक्ति, नेतृत्व, करुणा और सामाजिक परिवर्तन की महत्ता को भी रेखांकित किया। उनका संबोधन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और वैश्विक मानवीय सरोकारों के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में सामने आया।

उद्घाटन समारोह में चर्च ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर-डे सेंट्स के अध्यक्ष डैलिन एच. ओक्स मेजबान के रूप में उपस्थित रहे। माइकल ओ. लीविट ने स्वागत संबोधन दिया, जबकि कॉकसस क्षेत्र के मुख्य इमाम हिज वर्च्यू इमाम अल्लाहशकुर पाशाजादेह ने प्रार्थना प्रस्तुत की। मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव शेख डॉ. मोहम्मद बिन अब्दुलकरीम अल-ईसा, जी20 अंतरधार्मिक मंच के अध्यक्ष डब्ल्यू. कोल डरहम जूनियर और उपाध्यक्ष कैथरीन मार्शल सहित कई प्रमुख वक्ताओं ने भी विचार रखे।

अपने संबोधन में साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि आशा का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कठिनाइयां नहीं आएंगी, बल्कि आशा वह आंतरिक शक्ति है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य, सद्भाव और सृजन की संभावनाओं को जीवित रखती है। उन्होंने ऐतिहासिक टैबरनेकल के निर्माण की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संघर्ष और कठिनाइयों के बाद वहां पहुंचे लोगों ने केवल एक दुर्ग नहीं बनाया, बल्कि ऐसा स्थान तैयार किया, जहां लोग एक साथ गा सकें। यह इस बात का प्रतीक है कि कठिन परिस्थितियों में भी एकता, सौंदर्य और सामंजस्य का सृजन किया जा सकता है।

अमेरिका में जन्मीं और पिछले तीन दशकों से हिमालय की गोद में मां गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में स्वामी चिदानंद सरस्वती के सान्निध्य में आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर रहीं साध्वी जी ने कहा कि आशा ऐसी मनःस्थिति नहीं है, जिसकी केवल प्रतीक्षा की जाए, बल्कि यह ऐसी क्षमता है, जिसे अपने भीतर विकसित किया जा सकता है। प्रत्येक धर्म और आध्यात्मिक परंपरा अपने श्रेष्ठ स्वरूप में मनुष्य को आशा, आत्मविश्वास और सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि दुनिया को जोड़ने से पहले हमें अपने भीतर और अपने संबंधों में आई टूटन को दूर करना होगा। दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मचिंतन, करुणा और विश्वास को अपनाकर ही आंतरिक शांति से वैश्विक सद्भाव की ओर बढ़ा जा सकता है।

भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान प्रस्तुत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेश का उल्लेख करते हुए साध्वी जी ने कहा कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। हम सभी एक ही पृथ्वी की संतान हैं और हमारा भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यह दर्शन केवल आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वैश्विक निर्णयों, सामाजिक नीतियों और मानवीय व्यवहार का मार्गदर्शक सिद्धांत बनना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि विश्व वास्तव में एक परिवार है, तो भूख, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, ऋण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर निर्णय लेते समय सबसे कमजोर और वंचित समुदायों के कल्याण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्वच्छ जल, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा से वंचित बच्चे केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमारे अपने परिवार के सदस्य हैं। किसी भी परिवार की संवेदनशीलता का वास्तविक परिचय इस बात से मिलता है कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्यों की कितनी देखभाल करता है।

साध्वी भगवती सरस्वती ने आस्था को मानवता की सेवा और सकारात्मक परिवर्तन से जोड़ने पर जोर देते हुए कहा कि आध्यात्मिकता केवल प्रार्थना, उपासना और व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सच्ची आस्था हमें जीवन, प्रेम, मानवीय गरिमा और आशा के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा देती है। उन्होंने पृथ्वी के संरक्षण को भी सामूहिक उत्तरदायित्व बताते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित करने का आह्वान किया।

भारतीय वैदिक परंपरा के सामूहिक सद्भाव के संदेश को उद्धृत करते हुए उन्होंने ऋग्वेद की ऋचा ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ का स्मरण कराया। इसका भावार्थ है कि हम साथ चलें, साथ संवाद करें और हमारे मनों में सामंजस्य स्थापित हो।

संबोधन के समापन पर साध्वी भगवती सरस्वती ने समस्त सृष्टि के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हुए शांति प्रार्थना की—‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।’

उनका संदेश स्पष्ट था कि विश्व में स्थायी शांति तभी संभव है, जब आशा हमारे विचारों में, करुणा हमारे संबंधों में और सेवा हमारे कर्मों में साकार हो। साध्वी जी के संबोधन ने भारतीय सनातन दर्शन के सार्वभौमिक संदेश और वैश्विक सद्भाव की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

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