परमार्थ निकेतन में माँ भगवती की आराधना, विश्वकल्याण की कामना के साथ नवरात्रि का संदेश
स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—कन्याओं को जिमाएँ भी और जमाएँ भी, उन्हें शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता के अवसर दे
ऋषिकेश। हिमालय की पावन गोद में माँ गंगा के तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर माँ आदिशक्ति की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की गई। मंत्रोच्चार, आध्यात्मिक साधना और विश्वकल्याण की मंगलकामनाओं के बीच गंगा तट का वातावरण भक्तिमय हो उठा। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने नवरात्रि को अंतःशक्ति के जागरण, आत्मशुद्धि और मानवता की सेवा का महापर्व बताया।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि नवरात्रि केवल माँ दुर्गा की आराधना का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर की शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने का अवसर भी है। माँ भगवती की उपासना हमें अज्ञान, अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त कर सत्य, धर्म, प्रेम और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में शक्ति को सृष्टि का मूल आधार माना गया है। माँ आदिशक्ति सृजन, संरक्षण, साहस, करुणा और परिवर्तन की प्रतीक हैं। नवरात्रि का संदेश है कि आध्यात्मिक साधना का प्रभाव हमारे विचारों, व्यवहार और कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने श्रीदुर्गासप्तशती का उल्लेख करते हुए कहा कि देवी महात्म्य धर्म की स्थापना और आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय का संदेश देता है। नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना श्रद्धालुओं को दृढ़ता, तप, साहस, सृजन, वात्सल्य, निर्भयता, पवित्रता और सिद्धि जैसे दिव्य गुणों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है।
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान
अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस और नवरात्रि के अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने संदेश दिया कि कन्याओं को केवल पूजना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “कन्याओं को जिमाएँ भी और जमाएँ भी।” अर्थात बेटियों को सम्मान देने के साथ उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने, अपनी पहचान बनाने और जीवन में ऊँची उड़ान भरने के लिए सक्षम बनाना होगा। प्रत्येक बेटी को शिक्षा, सुरक्षा और समान अवसर मिलें, तभी नारी शक्ति की सच्ची आराधना सार्थक होगी।
स्वामी जी ने कहा कि नवरात्रि की साधना सेवा, सद्भाव और संवेदनशीलता के रूप में प्रकट होनी चाहिए। समाज के प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर वंचित वर्गों तक सहयोग और करुणा पहुँचाना भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि व्रत का अर्थ केवल आहार पर संयम रखना नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार को शुद्ध बनाना भी है। जप के साथ आत्मचिंतन, उपासना के साथ सदाचार और भक्ति के साथ सेवा का समन्वय ही साधना को पूर्णता प्रदान करता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने माँ भगवती से प्रार्थना की कि सभी के जीवन में शक्ति, शांति और सद्बुद्धि का संचार हो। प्रत्येक हृदय में करुणा, प्रत्येक घर में मंगल और सम्पूर्ण विश्व में प्रेम, शांति एवं सद्भाव की अविरल धारा प्रवाहित होती रहे।

