ऋषिकेश

सर्वपितृ अमावस्या पर परमार्थ निकेतन में विशेष पूजन-अर्चन, स्वामी चिदानन्द सरस्वती बोले—मन की शांति और कृतज्ञता में छिपा स्वस्थ जीवन का आधार

ऋषिकेश। सर्वपितृ अमावस्या के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में विशेष पूजन-अर्चन किया गया। इस अवसर पर पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और भारतीय सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को स्मरण किया गया। वहीं, विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर भारतीय ऋषि परंपरा में निहित मन की शांति, आत्मबोध और जीवन संतुलन के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि सर्वपितृ अमावस्या केवल पितरों के तर्पण और श्राद्ध का पर्व नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, संस्कारों और जीवन परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी है। हमारे अस्तित्व में पूर्वजों का तप, त्याग, अनुभव और संस्कार समाहित हैं। उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमें अपने अतीत से जोड़ता है और वर्तमान जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें याद दिलाता है कि जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है, उसी प्रकार मन की शांति, भावनात्मक संतुलन और आत्मिक प्रसन्नता भी स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनाव और मानसिक चुनौतियों के बीच भारतीय ऋषि परंपरा का जीवन दर्शन विशेष प्रासंगिक है।

ऋषि परंपरा में निहित है मन को साधने का मार्ग

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ध्यान, प्राणायाम, योग, मंत्र-जप, स्वाध्याय, सत्संग, मौन और सेवा जैसी साधनाओं के माध्यम से मन को समझने और जीवन में संतुलन स्थापित करने के मार्ग बताए। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का सूत्र ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ चित्त की वृत्तियों को संयमित और स्थिर करने की साधना का संदेश देता है। वहीं, भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से चंचल मन को साधने का मार्ग बताया है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना, नियमित दिनचर्या अपनाना, योग करना और आत्मीय संबंधों को मजबूत बनाना भी मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल में सहायक हो सकता है। भारतीय परंपरा में परिवार, गुरुकुल, आश्रम, सत्संग और सामूहिक प्रार्थना व्यक्ति को अपनत्व, मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करने के महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं।

मानसिक परेशानी में सहायता लेना कमजोरी नहीं

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि योग और ध्यान मन को संतुलित रखने में सहायक साधन हैं, लेकिन लंबे समय तक अवसाद, अत्यधिक चिंता, अनिद्रा या अन्य मानसिक कठिनाइयों का सामना करने वाले लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श और आवश्यक चिकित्सकीय सहायता लेना भी महत्वपूर्ण है। सहायता मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक है।

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि ऐसा वातावरण बनाया जाए, जहां प्रत्येक व्यक्ति को सुना जाए, समझा जाए और सम्मान मिले। परिवार में संवेदना, समाज में सहयोग और जीवन में साधना की भावना से ही स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है।

आत्मकल्याण के साथ सर्वकल्याण का संदेश

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि सनातन संस्कृति का वास्तविक संदेश केवल आत्मकल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि सर्वकल्याण है। जब मन में शांति, परिवार में संवेदना और समाज में सहयोग की भावना होती है, तभी स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ परिवार और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण होता है।

सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर समस्त पितरों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए मां गंगा और परमात्मा से सभी के जीवन में शांति, सद्बुद्धि, स्वास्थ्य और सद्भाव बनाए रखने की प्रार्थना की गई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *